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दिन में तीन बार रंग बदलता है 1000 साल पुराना अचलेश्वर का शिवलिंग

दिन में तीन बार रंग बदलता है 1000 साल पुराना अचलेश्वर का शिवलिंग

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धौलपुर के चम्‍बल नदी के बीहड़ों में शिव मंदिर में एक ऐसा शिवलिंग है जो दिन में तीन बार रंग बदलता है. वैसे तो धौलपुर जिला चंबल के बीहड़ और डाकुओं के नाम से विश्व में जाना-पहचाना जाता है। इस जिले की एक और विशेषता है, वह है यहां चंबल के बीहड़ों में स्थापित हजारों वर्ष पुराना अचलेश्वर महादेव मंदिर। कारण है कि यहां पर स्थापित शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है। शहर से लगभग 5 किमी दूरी पर चंबल के बीहड़ों में स्थापित मंदिर के पुजारी का कहना है कि यहां पर शिवलिंग के साथ-साथ यहां पर स्थित उनके अंगूठे का भी पूजन किया जाता है। उन्होंने बताया कि यहां शिवलिंग का रंग सुबह के समय लाल, दोपहर में केसरिया और रात को सांवला हो जाता है।

यह मंदिर हजारों वर्ष प्राचीन है। मंदिर के महंत मनोज दास का कहना है कि सैकड़ों वर्ष पहले कुछ लोगों ने धन के लालच में शिवलिंग के नीचे खुदाई की थी। लगभग 20 फीट नीचे तक खुदाई करने के बाद भी उन्हें यहां से कुछ हासिल नहीं हुआ। इस कारण उन्होंने शिवलिंग को नष्ट करने का भी प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो सके। इस घटना के बाद से अचलेश्वर महादेव की मान्यता और ज्यादा बढ़ गई। इस मंदिर की मान्यता है कि जो भी यहां पर आकर सच्चे मन से शिवलिंग की पूजा-अर्चना कर मनोकामना मांगता है। भगवान शिव उसकी इच्छा जरूर पूरी करते हैं। उन्होंने बताया कि इस शिवलिंग की एक और विशेषता है कि यह जमीन में कितना गहरा है, किसी को नहीं पता। हालांकि पहले कई लोगों ने इस शिवलिंग की लंबाई पता करने की कोशिश भी की, लेकिन असफल रहे।

दिन में तीन बार बदलता हैं शिवलिंग का रंग

इस अचलेश्वर महादेव मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य ये हैं कि इस मंदिर में स्थित शिवलिंग का रंग दिन में तीन बार अपने आप बदलने लगता हैं, सुबह के समय इस शिवलिंग का रंग लाल होता हैं, दिन के समय ये केसरिया रंग में बदल जाता हैं और रात में इसका रंग सांवला हो जाता हैं। शिवलिंग के इस स्वरूप को देखने के लिए ही लाखों की संख्या में यहा भक्त जुटते हैं।

वैज्ञानिक भी नहीं पता लगा सके रंग बदलने का क्या हैं राज

अचलेश्वर महादेव के इस शिवलिंग के पीछे के रहस्य की वजह का आज तक वैज्ञानिक भी पता नहीं लगा पाएं हैं बताया जाता हैं कि शिवजी का ये मंदिर बहुत पुराना हैं और इसकी उत्पत्ति के बारें में कुछ नहीं कहा जा सकता हैं। इसके अलावा इस मंदिर के बारें में ये भी कहा जाता हैं कि यहां शिवलिंग के दर्शन करने से लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

ये देश का सबसे पुराना जीवित मंदिर है..जहाँ पिछले 1913( तात्कालिक प्रमाण के अनुसार,यह और पुराना हो सकता है) सालों से बिना किसी रूकावट के प्रतिदिन पूजा और प्रसाद की परंपरा जारी रही है,इसलिए इसे सबसे पुराना जीवित मंदिर कहा जाता है, जहाँ कभी पूजा बंद नहीं हुई है..

– सूर्य की स्थित बदलने के साथ शिवलिंग का भी रंग बदल जाता है..

– इस मंदिर का उल्लेख कनिंघ्म ने भी अपनी पुस्तक में किया है..

– पहाड़ी पर बिखरे हुए पत्थर एवं स्तम्भ पर श्रीयंत्र सरीखे कई सिद्ध यंत्र एवं मंत्र उत्कीर्ण हैं..

– मंदिर की प्राचीनता का आभास यहां मिले ‘महाराजा दुत्‍तगामनी’ की मुद्रा (seal) से भी होता है, जो बौद्ध साहित्‍य के अनुसार ‘अनुराधापुर वंश’ का था और ईसा पूर्व 101-77 में श्रीलंका का शासक रहा था..यानी यह 1913 सालों से भी पुराना हो सकता है..

इस मंदिर का निर्माण जिस सिद्धांत पर हुआ है, उस सिद्धांत का जिक्र अथर्ववेद में मिलता है… शुभ संध्या 🙏 ऊँ नमः शिवाय

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