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सदा रहना चाहते हैं स्वस्थ तो आज ही घर ले आइये पुनर्नवा

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प्राचीन काल से ही भारत में औषधियों का बड़ा महत्व रहा है। जी हां, औषधियों द्वारा न सिर्फ छोटी मोटी बीमारियों से राहत पाई जा सकती है, बल्कि जानलेवा बीमारियां भी इससे दूर रहती हैं। प्राचीनकाल में जब डॉक्टर नहीं हुआ करते थे, तब ऋषि मुनि औषधि से ही लोगों को ठीक करते थे। ऐसे में आज हम आपके लिए एक ऐसी औषधि लेकर आएं हैं, जिसकी मदद से कैंसर तक भी ठीक हो सकता है। तो चलिए जानते हैं कि हमारे इस लेख में आपके लिए क्या खास है ?

आज हम आपको पुनर्नवा के बारे में बताने जा रहे हैं। यह एक ऐसी औषधि है, जिसके इस्तेमाल से बड़ी से बड़ी बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। पुनर्नवा संस्कृत के दो शब्दों पुन: यानि फिर से और नव यानि नया से मिलकर बन हुआ है। इसका मतलब हुआ कि नया जीवन। जी हां, पुनर्नवा मानव शरीर को नया जीवन देने में मददगार है। इसलिए इस औषधि का भारतीय समाज में बड़ा महत्व है। पुनर्नवा के इस्तेमाल से कई सारे रोगों से शरीर मुक्त रहता है और हमेशा जवां रहता है।

कैसे करें पुनर्नवा का इस्तेमाल?

पुनर्नवा का इस्तेमाल आप खाने के साथ कर सकते हैं। जी हां, दाल या सब्जी में एक चम्मच पुनर्नवा डालने से सारी बीमारी दूर रहती है। इसके अलावा आप पुनर्नवा का इस्तेमाल शहद के साथ भी कर सकते हैं। इसके पत्ते को एक चुटकी काली मिर्च के साथ शहद में मिक्स करके खा सकते हैं। ऐसा करने से आप तमाम बीमारियों से खुद को बचा सकते हैं। आप चाहे तो इसका इस्तेमाल दूध या अश्वगंधा के साथ भी कर सकते हैं। इतना ही नहीं, पुनर्नवा का शरबत भी कुछ लोग पीते हैं। इसके लिए आप पुनर्नवा के पत्ते में मिश्री चूर्ण और पीपर चूर्ण मिलाकर पकाए और फिर इसे छान कर पीएं।

पुनर्नवा के फायदे – यूं तो पुनर्नवा के ढेर सारे फायदे हो सकते हैं, लेकिन हम यहां आपको कुछ विशेष फायदे के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी चर्चा नीचे है –

1. पाचन को ठीक करे – यदि आपको पाचन से संबंधित कोई बीमारी है, तो आपको इसका रोज़ाना एक चम्मच सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से पेट संबंधी सभी बीमारियां दूर हो जाएंगी।

2. चर्मरोग से छुटकारा पाएं – यदि किसी को चर्मरोग, दाग या धब्बे हैं, तो वह उस स्थान पर पुनर्नवा के जड़ को पीसकर लगाए। कुछ दिन में ही इसका असर दिखने लगेगा।

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3. वजन कंट्रोल करे – पुनर्नवा के सेवन से आपका वजन बिल्कुल कंट्रोल रहेगा। यानि आप न ज्यादा मोटे होंगे और न ही ज्यादा पतले होंगे, बल्कि आपका वजन एकदम परफेक्ट रहेगा।

4. आंखों से पानी गिरना – पुनर्नवा की जड़ में शहद मिलाकर आंखों के नीचे लगाने से आंखो से पानी गिरना बंद हो जाएगा

5. आंखों से संबंधित समस्या – यदि आपकी आंखें सूजी हुई हैं तो आपको पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आंखों पर लगाएं और यदि खुजली हो तो पुनर्नवा की जड़ को दूध में मिलाकर लगाएं।

6. कैंसर से निज़ात – पुनर्नवा की जड़े और पत्ते कैंसर के मरीज़ों के लिए वरदान है। जी हां, इसके इस्तेमाल से बॉडी में नयी कोशिकाएं बनने लगती हैं और धीरे धीरे कैंसर से लड़ने में मरीज़ कामयाब हो जाता है।

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7. पथरी से निज़ात – यदि किसी को पथरी है, तो वह पुनर्नवा रोज़ाना शाम और सुबह को दूध में मिलाकर पीएं। ऐसा करने से कुछ ही दिनों में पथरी पैशाब के रास्ते से बाहर निकल जाएगी।

8. पीलिया से निज़ात – यदि किसी को पिलिया हुआ हो तो वह पुनर्नवा का इस्तेमाल शहद के साथ करे, ऐसा करने से जल्दी ही आराम मिल जाएगा।

9. फोड़ा फुंसी आदि – यदि किसी को फोड़ा फुंसी आदि हुआ हो तो पुनर्नवा को देसी घी में मिलाकर रोज़ाना पीएं, जल्दी ही फायदा मिलेगा

10. बवासीर – यदि किसी को बवासीर है, तो वह पुनर्नवा को पीसकर बकरी के दूध में मिलाकर पीए, इससे फौरन ठीक हो जाएगा।

11.जोड़ो का दर्द – यदि आप जोड़ो के दर्द से परेशान है तो आपको पुनर्नवा का इस्तेमाल करना चाहिए, इससे जल्दी आराम मिलेगा।

12. खून साफ होगा – पुनर्नवा के इस्तेमाल से खून साफ हो जाता है और इससे जुड़ी तमाम समस्याएं दूर हो जाती हैं।

13. कुत्ते का विष – यदि किसी को कुत्ता काट जाए तो उसे रोज़ाना कुछ दिनों तक पुनर्नवा को दूध में मिलाकर पीना चाहिए, इससे जल्दी घाव भरता है।

14. एनर्जी के लिए – यदि आपको हमेशा कमज़ोरी महसूस होती है, तो आपको इसका इस्तेमाल ज़रूर करना चाहिए।

15. दम रोग – दमा के मरीज़ों के लिए पुनर्नवा एक वरदान है। इसके लिए भारंगमल चूर्ण में पुनर्नवा चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाना चाहिए, जिसे मरीज़ को पिलाना चाहिए। इससे जल्दी आराम मिलेगा।

गठिया में भी पुनर्नवा बहुत उपयोगी माना गया है। 1 ग्राम पुनर्नवा की जड़ के पाउडर को अदरक और कपूर के साथ मिलाकर काढ़ा बना कर 7 दिनों के लिए उपयोग करें। गठिया में बहुत आराम मिलेगा।

त्वचा रोग के इलाज में – पुनर्नवा की जड़ को तेल में गर्म कर के त्वचा पर मालिश करें। यह सभी प्रकार के त्वचा रोग के इलाज में उपयोगी है। यह रक्त को शुद्ध करता है और त्वचा को युवा बनाता है। पुनर्नवा की जड़ का पानी त्वचा की एलर्जी जैसे खुज़ली, चकत्ते आदि के इलाज के लिए भी उपयोग हो सकता है। इस जड़ी बूटी का नियमित उपयोग त्वचा को प्राकृतिक चमक देता है।

अस्थमा में भी पुनर्नवा लाभदायक है-  500 मिलीग्राम हल्दी के साथ 3 ग्राम पुनर्नवा की जड़ का पाउडर बना लें। इस पाउडर का दिन में दो बार गुनगुने पानी के साथ उपयोग करें। इसके उपयोग से अस्थमा में लाभ मिलेगा। पुनर्नवा की सूखी पत्तियों का उपयोग ब्रोन्कियल अस्थमा के उपचार में किया जा सकता है। इन पत्तियों का काढ़ा अस्थमा पीड़ित लोगों के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है, इस में अदरक का रस और काली मिर्च मिलाने से यह और अधिक प्रभावशाली बन जाता है।

अनिद्रा में भी पुनर्नवा बहुत उपयोगी है। पुनर्नवा का 50-100 मिलीलीटर काढ़ा बना कर उपयोग करें। यह नींद की गोलियों के रूप में काम करता है और आप को गहरी नींद दिलाता है।

प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि हो जाने पर- प्रोस्टेट हमारे शरीर में एक छोटी सी ग्रंथि होती है जिसका आकर अखरोट के समान होता है। यह पुरुष में मूत्राशय के नीचे तथा मूत्रनली के आसपास स्थित होती है। 50 वर्ष की आयु के बाद प्रोस्टेट की समस्या आम हो जाती है। प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि हो जाने पर पुनर्नवा की जड़ों के चूर्ण का सेवन लाभकारी होता है।

गुर्दे से संबंधित विकारों के इलाज के लिए- पुनर्नवा का उपयोग ना सिर्फ गुर्दे को साफ करता है बल्कि पुनर्नवा के उपयोग से गुर्दे की पथरी से भी छुटकारा पाया जा सकता है। इसके लिए आप सम्पूर्ण पुनर्नवा के पौधे का काढ़ा बनायें और 10-20 ग्राम काढ़े का प्रतिदिन उपयोग करें। यह गुर्दे से संबंधित विकारों के इलाज के लिए बहुत लाभदायक है।

पीलिया में काफी लाभ – पीलिया के रोग में आँखों तथा शरीर की त्वचा का रंग बदल कर पीला हो जाता है, मूत्र में पीलापन, बुखार तथा कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। पुनर्नवा का पंचांग – जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज को शहद या मिश्री के साथ सेवन करें तथा इसका रस या काढ़ा पिएं। पुनर्नवा के संपूर्ण पौधे के रस में हरड़ के फलों का चूर्ण मिलाकर लेने से पीलिया में काफी लाभ मिलता है। सुबह और शाम पुनर्नवा की 3-4 जड़ें धोएं और इन जड़ों का पेस्ट बनाएं। अब इस पेस्ट में थोड़ा पानी और चीनी मिलाएं और इसका सेवन करें। पपुनर्नवा का स्वाद कड़वा होता है इसलिए इस पेस्ट का कड़वापन दूर करने के लिए इसमें चीनी मिलाई जाती है।

जवानी बढ़ाने वाली दवा- आयुर्वेद के अनुसार इस पौधे में यह क्षमता है कि इसके सेवन से व्यक्ति अपने आप को पुनः जवान बना सकता है। मध्य प्रदेश के पालकोट के आदिवासी इसे जवानी बढ़ाने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल करते हैं। पुनर्नवा की 2 चम्मच ताजी जड़ का रस 2-3 माह तक नियमित रूप से सेवन करने से वृद्ध व्यक्ति भी युवा की तरह महसूस करता है।

मधुमेह का इलाज – आयुर्वेदिक चिकित्सकों ने मधुमेह का इलाज करने के लिए पुनर्नवा को एक काफी फ़ायदेमं जड़ी बूटी बताया है। रिसर्च द्वारा यह पाया गया है कि यह वास्तव में मधुमेह के इलाज में मदद कर सकता है। एक पशु अध्ययन में पाया गया कि पुनर्नवा का सेवन करने से मधुमेह से पीड़ित चूहों में रक्त ग्लूकोज का स्तर कम हुआ। पुनर्नवा इंसुलिन के स्राव में सुधार करने काम कर सकता है। हालांकि यह आपकी मधुमेह की दवा की जगह तो नहीं ले सकता है, पर पुनर्नवा लेने से पहले अपने डॉक्टर से बात करें।

तनाव- पुनर्नवा में तनाव से लड़ने के गुण होते हैं। एक अध्ययन में, जब चूहों को सीमित जगह में घुमने के लिए मजबूर किया गया, तो देखा गया की थोड़ी देर बाद चूहों ने घूमना बंद कर दिया। जो अवसाद जैसी मानसिक स्थिति का एक व्यवहारिक संकेत होता है। लेकिन जब उन्हें पनर्नवा की जड़ों का सेवन करवाया गया, तो उन्हें तनाव को सहन करने की क्षमता मिली और लंबे समय तक घुमने में सक्षम रहे।

औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

शिरोरोग- प्रातकाल पुनर्नवा मूल त्वक् चूर्ण का नस्य लेने तथा हलवे का भोजन करने से शिरोवेदना का शमन होता है।

नेत्रशुक्र- समभाग श्वेत अपराजिता मूल, श्वेत पुनर्नवा मूल तथा जौ के कल्क से नेत्रों में अंजन करने से नेत्रशुक्र रोग में लाभ होता है। पुनर्नवा मूल को नारी दुग्ध में घिसकर नेत्रों में लगाने से नेत्रशूल, नेत्रकण्डू आदि रोगों में लाभ होता है।

पुनर्नवा मूल को कांजी व तैल या जल में घिसकर लगाने से निशान्धता (रात्रि अंधता) रोग व मोतियाबिंद में लाभ होता है। श्वेत पुनर्नवा मूल को घृत व मधु में पीसकर अंजन करने से नेत्र रोगों व नेत्रस्राव का शमन होता है।

पुनर्नवा मूल स्वरस में भाङ्गरा स्वरस मिलाकर लगाने से नेत्रकण्डू में लाभ होता है तथा गोमय स्वरस में श्वेत पुनर्नवा मूल तथा पिप्पली मिलाकर अंजन करने से नक्तांध्य (रात्रि अंधता) में लाभ होता है। पुनर्नवा की जडों को पीसकर घी व शहद में मिलाकर अंजन करने से आंख की फूली व लालिमा दूर होती है। पुनर्नवा की जडों को भांगरे के रस के साथ घिसकर आंखों में लगाने से नेत्रकण्डू का शमन होता है।

मुखपाक- पुनर्नवा की जडों को दूध में घिसकर छालों पर लेप करने से मुखपाक में लाभ होता है।

कास- 1-2 ग्राम पुनर्नवा मूल चूर्ण में समभाग शक्कर मिलाकर दिन में दो बार खाने से शुष्क कास का शमन होता है।

दमा- पुनर्नवा मूल के तीन ग्राम चूर्ण में 5 ग्राम हल्दी मिलाकर प्रात सायं खिलाने से दमे में लाभ होता है।

र क्षत- यदि उर क्षत के रोगी के थूक में बार-बार रक्त आ रहा हो तो 5-10 ग्राम पुनर्नवा मूल तथा शाठी चावलों के चूर्ण को मुनक्का के रस, दूध और घी में पकाकर पीने के लिए रोगी को दें। हृदय रोगों में पुनर्नवा के पत्तों का शाक अत्यन्त लाभकारी है। यह हृदय रोगजन्य अस्थमा में अत्यन्त लाभकारी है।

क्षुधावर्धनार्थ- पुनर्नवा मूल के 3 ग्राम चूर्ण को पीसकर शहद के साथ खाने से भूख बढ़ती है।

विरेचनार्थ- पुनर्नवा मूल चूर्ण को दिन में दो बार चाय के चम्मच जितनी मात्रा में लेने से मृदु विरेचक का काम करता है।

उदर रोग- पुनर्नवा मूल को गोमूत्र के साथ देने से सब प्रकार के शोथ तथा उदर रोगों का शमन हो जाता है।

जलोदर- पुनर्नवा के 40-60 मिली फाण्ट में 1-2 ग्राम शोरा डालकर पिलाने से जलोदर में लाभ होता है।

उदररोग- हरीतकी, सोंठ, गुडूची, पुनर्नवा, देवदारु या दारुहरिद्रा से निर्मित क्वाथ में गुग्गुलु तथा गोमूत्र मिला कर पीने से उदररोग तथा तज्जन्य शोथ का निवारण होता है।

गुल्म- पुनर्नवामूल तथा कालशाक में सैन्धव मिलाकर सेवन करने से गुल्म तथा तोद (सुई चुभाने जैसी पीड़ा) में लाभ होता है। पुनर्नवा, काली मरिच, शरपुंखा, सोंठ, चित्रक, हरीतकी, करंज तथा बेल मज्जा इन औषधियों से निर्मित 20-30 मिली क्वाथ का सेवन करने से बवासीर, गुल्म तथा ग्रहणी में लाभ होता है।

परिस्राव- रक्त तथा श्वेत पुनर्नवा के कल्क से पकाए दुग्ध की वस्ति देने से विरेचन व्यापदजन्य परिस्राव रोग का शमन होता है।

पांडु- पुनर्नवा कामला रोग की बहुत गुणकारी औषधि है। 10-20 मिली पुनर्नवा पञ्चाङ्ग रस में हरड़ का 2-4 ग्राम चूर्ण मिलाकर पीने से कामला में लाभ होता है।

प्लीहावृद्धि-श्वेत पुनर्नवा की 10-20 ग्राम मूल को तंडुलोदक के साथ पीसकर देने से प्लीहावृद्धि में लाभ होता है। 

मूत्रकृच्छ्र- पुनर्नवा के 5-7 पत्तों को 2-3 नग काली मिर्च के साथ घोट-छानकर पिलाने से मूत्रवृद्धि होकर मूत्र त्याग काठिन्य में लाभ होता है। 5-10 मिली पुनर्नवा के पत्र रस को दूध में मिलाकर पिलाने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है। 3 ग्राम पुनर्नवा मूल चूर्ण को शहद या गुनगुने जल के साथ सेवन करने से शोथ, मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्रदाह का शमन होता है।

वृक्क विकार- 10-20 मिली पुनर्नवा पञ्चाङ्ग क्वाथ को पिलाने से गुर्दे के विकारों को भी दूर करता है।

प्रमेह- 1 ग्राम पुनर्नवा पुष्प चूर्ण में 3 ग्राम मिश्री मिलाकर दुग्ध के साथ सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।

प्रदर रोग- 3 ग्राम पुर्ननवा मूल चूर्ण को जलभांगरे के रस के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है।

योनिशूल- पुनर्नवा स्वरस को योनि में लेप करने से योनिशूल का शमन होता है।

सुखप्रसव- पुनर्नवा मूल को तेल में स्निग्ध करके योनि में धारण करने से प्रसव शीघ्र हो जाता है।

गर्भाशय-विकार जन्य अनार्तव में पुनर्नवा की जड़ और कपास की जड़ का फाण्ट पिलाने से लाभ होता है। सोंठ तथा पुनर्नवामूल को बकरी के दूध में पीसकर योनि में लेप करने से योनिशोथ का शमन होता है। पुनर्नवा के पत्तों को घोटकर गोली बनाकर योनि में रखने से प्रसव पीड़ा से होने वाले योनिशूल का शमन होता है।

वातकंटक-श्वेत पुनर्नवा मूल को तेल में पकाकर पैरों में मालिश करने से वातकंटक रोग दूर हो जाता है।

आमवात-पुनर्नवा के क्वाथ के साथ कपूर तथा सोंठ के 1 ग्राम चूर्ण को सात दिन तक सेवन करने से आम का पाचन होकर आमवात में लाभ होता है।

कुष्ठ-इसको सुपारी के साथ खाने से कुष्ठ में लाभ होता है।

विद्रधि-श्वेत पुनर्नवा की 5 ग्राम जड़ को 500 मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष क्वाथ बनाकर 20-30 मिली मात्रा में सुबह-शाम पीने से अपक्व विद्रधि नष्ट होती है। पुनर्नवा की मूल को छाछ के साथ पीस-कर लेप करने से स्तनविद्रधि में लाभ होता है।

नारू-पुनर्नवा की जड़ और सोंठ को पुनर्नवा के ही रस में पीसकर नारू पर बांधने से नारू का शमन होता है।

अनिद्रा-20-40 मिली पुर्ननवा क्वाथ को पिलाने से रोगी को नींद अच्छी आती है।

शरीर पुष्ट-पुनर्नवा मूल चूर्ण को दूध के साथ सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।

शोथ-पुनर्नवा की जड़ तथा नागरमोथा, प्रत्येक द्रव्य को 10 ग्राम की मात्रा में लेकर इसका कल्क बना लें। इसे 640 मिली गाय के दूध में यथाविधि पकाकर प्रात सायं पीने से वातज शोथ में लाभ होता है।

सर्वांगशोथ-पुनर्नवा, नीम की छाल, पटोल पत्र, सोंठ, कटुकी, गिलोय, दारुहल्दी तथा हरड़ को समभाग लेकर क्वाथ बनाएं, जब चतुर्थांश शेष रह जाए तो इसे छानकर 20 से 30 मिली मात्रा में लेकर सुबह-शाम पीने से सर्वांग शोथ, उदर रोग, पार्श्वशूल, श्वास तथा पांडु रोग में लाभ होता है।

सूजन-पुनर्नवा मूल, देवदारु तथा मूर्वा को मिश्रित कर चूर्ण करके 3 ग्राम की मात्रा में आवश्यकतानुसार मधु के साथ देने से गर्भावस्था से उत्पन्न शोथ का शमन होता है। पुनर्नवा की जड़, चिरायता और शुंठी, तीनों को समान मात्रा में मिलाकर इसकी 20 ग्राम मात्रा लेकर 400 मिली जल में पकाकर चतुर्थांश शेष काढ़ा बनाकर पीने से सर्वांग जलमय शोथ में लाभ होता है। पुनर्नवा का काढ़ा पेशाब की जलन तथा मूत्र मार्ग में संक्रमण के कारण उत्पन्न ज्वर में भी तुरन्त लाभ पहुँचाता है। लाल पुनर्नवा, परवल की पत्ती, परवल का फल, करेला, पाठा, ककोड़ा इन सबका शाक ज्वर में हितकारी होता है। 2 ग्राम पुनर्नवा मूल चूर्ण को गाय के दूध के साथ सेवन करने से बल तथा वर्ण की वृद्धि होती है।

पुनर्नवा, नीम, गिलोय, सोंठ, देवदारु तथा हरड़ को समान भाग मिलाकर पीसकर 1-2 ग्राम चूर्ण को गर्म जल के साथ सेवन कराने से साध्यशोफ ठीक होते हैं। पुनर्नवा, नीम की अंतर्छाल, सोंठ तथा परवल के पत्तों को समभाग लेकर पानी में पीसकर शोफ स्थान पर लेप लगाने से शोफ का शमन होता है। पुनर्नवा, हरड़, बकली (रास्ना), देवदारु तथा एरंडबीज को समान मात्रा में लेकर गोमूत्र के साथ क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से शोफ में लाभ होता है। पुनर्नवा, दारुहल्दी, सोंठ, सरसों तथा सहजन इनको कांजी के साथ पीसकर लेप करने से शोथ का शमन होता है। 

रसायन वाजीकरण  :

रसायन प्रयोग-रोगनिवारण के बाद कमजोरी दूर करने के लिए इसे प्रयुक्त किया जाता है। यह एक रसायन है और बलवर्धक टानिक है।

  1. 5 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को नित्य दूध के साथ 6 मास तक लगातार पीने से बल की वृद्धि होती है तथा शरीर का पोषण होता है।
  2. बच्चों की बीमारी-पुनर्नवा पत्र स्वरस 100 मिली, मिश्री चूर्ण 200 ग्राम तथा पिप्पली चूर्ण 12 ग्राम इन तीनों को मिलाकर पकाएं, जब चाशनी गाढ़ी हो जाए तो उतारकर बन्द बोतल में भर लें, इस शरबत की 4-10 बूंद तक बच्चों को दिन में तीन बार चटाने से बच्चों की खांसी, श्वास, फूफ्फूस-विकार आदि अनेक बीमारियों में आराम होता है।
  3. सर्पविष-यह सभी प्रकार के सर्पविषों का एंटीडोट है।
  4. बिच्छू दंश-पुनर्नवा के पत्ते और अपामार्ग की टहनियों को पीसकर बिच्छू के डंक पर लगाने से दंशजन्य विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।
  5. रविवार और पुष्य नक्षत्र के दिन उखाड़ी हुई पुनर्नवा की जड़ को चबाने से बिच्छू का विष उतरता है।
  6. अलर्क विष-श्वेत पुनर्नवा मूल तथा धत्तूर बीज चूर्ण में तिलकल्क, तिल तैल, अर्क दुग्ध तथा गुड़ मिलाकर सेवन करने से श्वान दंशजन्य विष प्रभावों का शमन होता है।
  7. मूषक विष-श्वेत पुनर्नवा मूल चूर्ण को मधु के साथ नियमित सेवन करने से मूषक विष प्रभावों का शमन होता है।
  8. विषदोष-एक वर्ष तक चावल के धोवन के साथ श्वेत पुनर्नवा मूल कल्क को पुष्यनक्षत्र में पीने से वृश्चिक, साँप आदि विषैले जीवजन्तु का विष प्रभावी नहीं होता है।
  9. सर्पविष-श्वेत पुनर्नवा मूल को पीसकर चावल के धोवन (तण्डुलोदक) के साथ पीने से सर्पदंश जन्य विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।

अन्य प्रयोग  :

  1. इसकी जडों का घनक्वाथ बनाकर समभाग अश्वगंधा का चूर्ण मिलाकर 250 मिग्रा की गोलियां बना लें, एक-एक गोली खाकर ऊपर से मिश्री मिला दूध पीने से वीर्य दोष दूर होकर शरीर की झुर्रियां दूर हो जाती हैं अथवा पञ्चाङ्ग के चूर्ण को दूध और शक्कर के साथ सेवन करें।

प्रयोज्याङ्ग  : मूल, पत्र, पञ्चाङ्ग।

मात्रा  : बीज चर्णौं् 1-3 ग्राम स्वरस 5-10 मिली या चिकित्सक के परामर्शानुसार।

नोट  : वमन पुनर्नवा मूल चूर्ण अधिक मात्रा में सेवन करने से वमनकारक होता है।

विशेष  : श्वेत तथा रक्तभेद के आधार पर पुनर्नवा दो प्रकार का होता है। कई विद्वान वर्षाभू को श्वेत पुनर्नवा मानते हैं तथा बाजार में भी श्वेत पुनर्नवा के नाम पर वर्षाभू पञ्चाङ्ग तथा मूल मिलता है। वस्तुत श्वेत पुनर्नवा व वर्षाभू दो भिन्न-भिन्न पौधे हैं। हमने गहन अनुसन्धान तथा कई शात्रों के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि श्वेत तथा रक्त पुनर्नवा का निर्धारण पुष्प के वर्ण के आधार पर नही अपितु मूल के वर्ण के आधार पर किया जाता है। रक्त पुनर्नवा की मूल रक्त वर्ण की तथा सफेद पुनर्नवा की मूल श्वेत वर्ण की होती है।

 

This Post Has One Comment

  1. Khushbu

    nice

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