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गर्भाशय में सूजन का आयुर्वेदिक इलाज !!

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ऋतुकालीन असावधानियों का कुप्रभाव यदि गर्भाशय को प्रभावित करता है तो उसमें शोथ (सूजन) उत्पन्न हो जाती है जिससे रुग्णा महिला को बहुत कष्ट उठाना पड़ता है । पेडू में दर्द और प्रदाह तो उसके सामान्य परिणाम हैं, किसी- किसी को दस्त लग जाते हैं तो किसी को दस्त की हाजत जैसी प्रतीत होती है, किन्तु दस्त नहीं होता। किसी को बार- बार मूत्र त्याग की इच्छा होती है, किन्तु वह भी व्यर्थ, किसी को ज्चर और ज्चर के साथ खाँसी भी हो जाती है और यदि रोग की उत्पत्ति शीत आदि के लगने से होती है तो ज्चर में तीव्रता बढ़ जाती है।

रोग- वृद्धि का कारण चिकित्सा के प्रति लापरवाही है । स्त्रियाँ लज्जा या संकोचवश अपने कष्ट की बात किसी से कह नहीं पातीं, इसीलिये समयोचित उपचार हो नहीं पाता । कभी- कभी कह देने पर भी पति आदि उस पर ध्यान नहीं देते, इस कारण रोग बढ़ता जाता है। रोग की सही चिकित्सा न होने अथवा प्रतिकूल प्रभाव वाली, तीक्ष्ण औषधियाँ भी इस रोग की उत्पत्ति और वृद्धि में कारण बन जाती हैं । यह इसलिये होता है कि रोग की यथार्थता को समझे बिना औषधियाँ आरम्भ कर दी जाती हैं ।

सामान्यतः. रोग नया हो तो शीघ्र काबू में आ जाता है, किन्तु रोग के अधिक बढ़ने पर रोगिणी अत्यन्त दुर्बल और अशक्त हो जाती है । उसके हाथ- पाँवों में भी दर्द आरम्भ हो सकता है, इसलिये चलना-फिरना, परिश्रम करना उसके वश की बात नहीं होती । किन्तु दूसरे लोग उसकी अन्तर्वेदना को समझ नहीं पाते । ऐसी रोगिणी को पूर्ण विश्राम की आवश्यकता होती है। यदि वह संकोचवश कार्य करने में प्रवृत्त हो, तो भी उसे वैसा नहीं करने देना चाहिये । उससे प्रेम और सहानुभूति का व्यवहार आवश्यक है।

गर्भाशय शोथ (सूजन) के कारण और भी अनेक हो सकते हैं

✦ सहसा रजोनिरोध या सहसा रजःस्राव, जो कि सहसा तीव्र ठण्ड अथवा अधिक उष्णता के कारण हो सकता है ।

✦ संसर्गकाल में उल्टे- सीधे आसनों के करने अथवा गर्भाशय में चोट लगने से भी वहाँ शोथ (सूजन) हो सकती है

✦ गर्भपात होने से भी गर्भाशय- शोथ की प्राप्ति सम्भव है ।

✦ तीक्ष्ण औषधियों के सेवन का प्रभाव भी गर्भाशय पर पड़ सकता है और वहाँ शोथ (सूजन) उत्पन्न हो सकती है।

✦ अति मैथुन, प्रमेही या मधुमेही से समागम|

✦ स्वयं को जीर्ण प्रदर रोग आदि अनेक कारण हो सकते हैं।

गर्भाशय में सूजन के लक्षण :

आरम्भ में तो यह अनुमान भी कठिन होता है कि रोगिणी गर्भाशय शोथ (सूजन) से ग्रसित है। किन्तु बाद में जब अनेक तत्सम्बन्धी लक्षण प्रकट हो जाते हैं, तब अनुमान में कुछ कठिनाई भी नहीं होती ।

✦ गर्भाशय से चिकने पदार्थ का स्राव होने लगता है तो वही रक्त मिश्रित कफ जैसा रूप ले लेता है । यदि उस पर काबू नहीं पाया जाता तो उसमें पीव पड़ सकती है।

✦ योनिकण्डु और वेदना का आभास होने लगता है ।

✦ वमनेच्छा, अफरा, उदरशूल आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।

आहार विहार :

रोगिणी का आहार विहार संयमित होना चाहिये । रोगोत्पत्ति में एक प्रबल कारण मिथ्या आहार विहार ही है। संसर्ग- निषेध का कड़ाई से पालन किया जाय ।

गरिष्ठ अन्न, पकवान, मिठाई, मिर्च मसाले युक्त शाक- सब्जी या चाट आदि कदापि न खाने दें । सुपाच्य भोजन दिया जाय । गेहूँ की चपाती, दलिया, दाल, खिचड़ी आदि अधिक हितकर है। फलों में पपीता, अंगूर, सन्तरा, सेब, गाजर आदि देने चाहिये। हरे शाक- सब्जी, परबल, पालक, बथुआ आदि का अधिक सेवन करायें । दूध, घी, मक्खनं आदि भी हितकर हो सकते हैं, किन्तु उनका सेवन रोगिणी की पाचन शक्ति पर निर्भर है।

कब्ज न होने दें । यदि कब्ज हो तो मूलरूप से औषधोपचार आरम्भ करने से पूर्व उसकी कोष्ठ- शुद्धि के लिये कोई सुख विरेचन दिया जा सकता है।

रात्रि – शयन समय हरड़- सोंफ की फंकी गर्म पानी के साथ दी जाय । शीत ऋतु हो तो सोंफ के स्थान पर सोंठ का भी प्रयोग कर सकते हैं । अथवा अन्य कोई ऐसी औषधि दी जानी चाहिये, जिससे कोष्ठशुद्धि भी हो जाय और रोगिणी को दुर्बलता भी न हो ।

गर्भाशय में सूजन के घरेलू उपचार :

योनि को भीतर से सेंकने और कीटाणु नाशक घोल से प्रक्षालन आवश्यक है | गर्म पानी का डूश (पानी का स्प्रे) देने से वैसी ही सिंकाई सहज रूप से हो जाती है । उसे गर्म पानी के टब में बैठाना भी बहुत लाभप्रद होता है ।

1- योनि – प्रक्षालन के लिये फिटकरी पीस कर पानी में डालें । उस पानी से योनि को धोना चाहिये । त्रिफला के क्वाथ से योनि प्रक्षालन करना बहुत लाभदायक है । गर्भाशयशोथ, स्राव आदि में यह प्रयोग नित्यप्रति किया जाना चाहिये ।

2- बरगद की छाल, गूलर की छाल, सिरस की छाल, पीपल की छाल और पाकर की छाल 50-50 ग्राम जौकुट कर, 1 लीटर पानी के साथ अर्धावशेष क्वाथ करें और उसमें 7 ग्राम सफेद फिटकरी का चूर्ण मिला कर उत्तर वास्ति के द्वारा दिन में दो बार योनि प्रक्षालन कराये ।

3-अण्डी के तैल में रुई का फाया भिगो कर योनि में रखना लाभदायक है ।

4-पुनर्नवा की जड़ तथा पत्तों के स्वरस से रुई के फाये को भिगोकर रखना भी एक उचित उपचार है ।

5-सोंठ और एरण्डमूल का चूर्ण पानी के साथ पीस कर योनि में लेप करने से वहाँ का शूल नष्ट हो जाता है । शुद्ध घी का लेप भी सामान्य प्रकार के शोथ(सूजन) में हितकर सिद्ध होता है । अन्य उचित लेप आदि के अभाव में इससे काम लिया जा सकता है।

6-विनौला का यथाविधि घृत सिद्ध करें और उसमें दिनौलों का महीन चूर्ण मिला कर, रुई की बत्ती पर लगायें और योनि में धारण करावें ।

7-मद्य में वस्त्र का टुकड़ा या बत्ती भिगोकर धारण करने से योनि की खाज, स्राव और पीड़ा दूर होती है।

8-नीम के क्वाथ उबाल कर छाने हुए जल से योनि- प्रक्षालन करना भी उपयोगी है।

9-आम, जामुन, बेल, कैथ और नींबू के पत्ते पंच पल्लव, चमेली के फूल और मुलहठी, इनका अत्यन्त महीन चूर्ण करके, गोघृत के साथ मिलायें और योनि के भीतर लगावें । इससे योनि कण्डु, दुर्गन्धित स्राव आदि में लाभ होता है ।

10-फिटकरी 2 प्रतिशत का जल के साथ द्राव बनायें और रुई की बत्ती उसमें भिगोकर गर्भाशय- पथ में रखने का प्रयत्न करें। किसी चिकनी, लकड़ी की डंडी पर रुई ठीक प्रकार से लपेट कर फिटकरी के घोल में भिगो लेने से यह कार्य सहज में ही हो सकता है |

11-वातदोष की अधिकता से उत्पन्न योनि दोष में, उसे तैल से चुपड़ कर, उसमें जटामाँसी का किंचित गर्म कल्क धारण करावें । इससे शोध आदि विकार भी दूर होते हैं।

गर्भाशय शोथ (सूजन) पर सरलोपचार :वच, काला जीरा, श्वेत जीरा, छोटी पीपल, वासा, सेंधा नमक, अजमोद, यवक्षार, चित्रकमूल और शर्करा समान भाग लेकर, पीस- छान कर चूर्ण बना कर रखें। मात्रा -2 माशे यह चूर्ण घृत के साथ भूनें और 2 तोले प्रसन्न स्वच्छ सुरा के साथ घोल कर पिलावें । इसके सेवन से सभी प्रकार के योनि तथा गर्भाशय के रोग मिट जाते हैं। यह योग हृद्रोग, गुल्म और अर्श में भी हितकर है।

पुराने गर्भाशय शोथ(सूजन) पर :कासनी की जड़, गुलबनफ्शा और वरियारी 6-6 ग्राम, गाजवाँ और तुख्म कसुम 5-5 ग्राम तथा मुनक्का 6 या 7 नग लेकर, उन्हें पाव भर पानी के साथ प्रातः छान कर पिला दें। यह प्रयोग नियमित रूप से आठ-दस दिन तक करना चाहिये । इससे गर्भाशय की सूजन, रक्तस्राव, श्लैष्मिक स्राव आदि में पर्याप्त लाभ होता है ।

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