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गायत्री मंत्र के जप से मिलते हैं ये चमत्कारी फायदे

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चमत्कारी है गायत्री मंत्र …!

गायत्री महामंत्र वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मन्त्र ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ और ऋग्वेद के छन्द 3.62.10 के मेल से बना है। इस मंत्र में सवितृ देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इसे श्री गायत्री देवी के स्त्री रुप मे भी पूजा जाता है।

मंत्रजप के लाभ— चमत्कारी है गायत्री मंत्र …!

शास्त्रों में गायत्री मंत्र को चमत्कार करने वाला माना गया है। इस मंत्र का जप करने से शीघ्र मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र का जप दिन में तीन बार करना चाहिए।

यानी आप गायत्री मंत्र का जप सूर्योदय से पहले, शाम में और रात्रि के पहले प्रहर में मंत्र का जप करना चाहिए। सुबह सामान्य आवाज में जप करें। शाम के समय जप मन में करना चाहिए। और रात्रि के पहले प्रहर में जप धीमी आवाज में करना चाहिए।

*गायत्री मंत्र का नियमित रुप से सात बार जप करने से व्यक्ति के आसपास नकारात्मक शक्तियाँ बिलकुल नहीं आती।

*जप से कई प्रकार के लाभ होते हैं, व्यक्ति का तेज बढ़ता है और मानसिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है।

*बौद्धिक क्षमता और मेधाशक्ति यानी स्मरणशक्ति बढ़ती है।
*गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर होते हैं, यह 24 अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं।

*ऋषियों ने गायत्री मंत्र को सभी प्रकार की मनोकामना को पूर्ण करने वाला बताया है।

*पुराणों में वर्णित है कि यदि रात्रि के पहले प्रहर में गायत्री मंत्र का जप करते हैं तो आस-पास मौजूद नकारात्मक शक्तियां वहां से चली जाती हैं।

जप करने से मिलेगा यह सब कुछ…?

त्वचा में आएगी चमक।
मन में सकारात्मकता का होगा वास।
क्रोध होगा शांत।
पूर्वाभास की क्षमता होगी प्रबल।
धार्मिक कार्यों में लगेगा मन।
एकाग्रता होगी प्रबल।

विचार

“गायत्री मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिए उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शान्त हृदय से किया हुआ जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।” – महात्मा गाँधी

“ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमको दिऐ हैं, उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है।” – मदन मोहन मालवीय

“भारतवर्ष को जगाने वाला जो मंत्र है, वह इतना सरल है कि ऐक ही श्वास में उसका उच्चारण किया जा सकता है। वह मंत्र है गायत्री मंत्र।” – रबीन्द्रनाथ टैगोर

“गायत्री में ऐसी शक्ति सन्निहित है, जो महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है।” – अरविंद”गायत्री का जप करने से बडी‍-बडी सिद्धियां मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है।” – रामकृष्ण परमहंस

“गायत्री सदबुद्धि का मंत्र है, इसलिऐ उसे मंत्रो का मुकुटमणि कहा गया है।” – स्वामी विवेकानंद

गायत्री’ एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है।

गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई, जो इस प्रकार है:

तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गोदेवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्। (ऋग्वेद ३,६२,१०)
भुवः : अंतरिक्ष लोक
स्वः : स्वर्गलोक
त : परमात्मा अथवा ब्रह्म

सवितुः : ईश्वर अथवा सृष्टि कर्ता
वरेण्यम : पूजनीय
भर्गः: अज्ञान तथा पाप निवारक
देवस्य : ज्ञान स्वरुप भगवान का
धीमहि : हम ध्यान करते है
धियो : बुद्धि प्रज्ञा
योः : जो
नः : हमें
प्रचोदयात् : प्रकाशित करें।

भावार्थ:- उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

यह मंत्र सर्वप्रथम ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों में केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों में इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई।

इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ:
(१) ॐ(२) भूर्भव: स्व:(३) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है।

गायत्री तत्व क्या है और क्यों इस मंत्र की इतनी महिमा है

इस प्रश्न का समाधान आवश्यक है। आर्ष मान्यता के अनुसार गायत्री एक ओर विराट् विश्व और दूसरी ओर मानव जीवन, एक ओर देवतत्व और दूसरी ओर भूततत्त्व, एक ओर मन और दूसरी ओर प्राण, एक ओर ज्ञान और दूसरी ओर कर्म के पारस्परिक संबंधों की पूरी व्याख्या कर देती है। इस मंत्र के देवता सविता हैं, सविता सूर्य की संज्ञा है, सूर्य के नाना रूप हैं, उनमें सविता वह रूप है जो समस्त देवों को प्रेरित करता है।

जाग्रत् में सवितारूपी मन ही मानव की महती शक्ति है। जैसे सविता देव है वैसे मन भी देव है (देवं मन: ऋग्वेद, १,१६४,१८)। मन ही प्राण का प्रेरक है। मन और प्राण के इस संबंध की व्याख्या गायत्री मंत्र को इष्ट है। सविता मन प्राणों के रूप में सब कर्मों का अधिष्ठाता है, यह सत्य प्रत्यक्षसिद्ध है। इसे ही गायत्री के तीसरे चरण में कहा गया है।

ब्राह्मण ग्रंथों की व्याख्या है-कर्माणि धिय:, अर्थातृ जिसे हम धी या बुद्धि तत्त्व कहते हैं वह केवल मन के द्वारा होनेवाले विचार या कल्पना सविता नहीं किंतु उन विचारों का कर्मरूप में मूर्त होना है। यही उसकी चरितार्थता है। किंतु मन की इस कर्मक्षमशक्ति के लिए मन का सशक्त या बलिष्ठ होना आवश्यक है। उस मन का जो तेज कर्म की प्रेरण के लिए आवश्यक है वही वरेण्य भर्ग है। मन की शक्तियों का तो पारवार नहीं है। उनमें से जितना अंश मनुष्य अपने लिए सक्षम बना पाता है, वहीं उसके लिए उस तेज का वरणीय अंश है। अतएव सविता के भर्ग की प्रार्थना में विशेष ध्वनि यह भी है कि सविता या मन का जो दिव्य अंश है वह पार्थिव या भूतों के धरातल पर अवतीर्ण होकर पार्थिव शरीर में प्रकाशित हो। इस गायत्री मंत्र में अन्य किसी प्रकार की कामना नहीं पाई जाती। यहाँ एक मात्र अभिलाषा यही है कि मानव को ईश्वर की ओर से मन के रूप में जो दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है उसके द्वारा वह उसी सविता का ज्ञान करे और कर्मों के द्वारा उसे इस जीवन में सार्थक करे।

गायत्री के पूर्व में जो तीन व्याहृतियाँ हैं, वे भी सहेतुक हैं। भू पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है। भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है। स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है। इस त्रिक के अन्य अनेक प्रतीक ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराणों में कहे गए हैं, किंतु यदि त्रिक के विस्तार में व्याप्त निखिल विश्व को वाक के अक्षरों के संक्षिप्त संकेत में समझना चाहें तो उसके लिए ही यह ॐ संक्षिप्त संकेत गायत्री के आरंभ में रखा गया है। अ, उ, म इन तीनों मात्राओं से ॐ का स्वरूप बना है। अ अग्नि, उ वायु और म आदित्य का प्रतीक है। यह विश्व प्रजापति की वाक है। वाक का अनंत विस्तार है किंतु यदि उसका एक संक्षिप्त नमूना लेकर सारे विश्व का स्वरूप बताना चाहें तो अ, उ, म या ॐ कहने से उस त्रिक का परिचय प्राप्त होगा जिसका स्फुट प्रतीक त्रिपदा गायत्री है।

विविध धर्म-सम्प्रदायों मे गायत्री महामंत्र का भाव

हिन्दू – ईश्वर प्राणाधार, दुःखनाशक तथा सुख स्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें। जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दें।

यहूदी – हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा।

शिंतो – हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों। हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे में अभद्र बातों का अनुभव न हो।

पारसी – वह परमगुरु (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भंडार के कारण, राजा के समान महान है। ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है।
दाओ (ताओ) – दाओ (ब्रह्म) चिन्तन तथा पकड़ से परे है। केवल उसी के अनुसार आचरण ही उ8ाम धर्म है।

जैन – अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार।
बौद्ध धर्म – मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ।

कनफ्यूशस – दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा कि तुम उनसे अपने प्रति नहीं चाहते।

सिख – ओंकार (ईश्वर) एक है। उसका नाम सत्य है। वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, र्निवैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है। वह गुरु की कृपा से जाना जाता है।

बहाई – हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है। तू ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्व निर्भर।

गायत्री उपासना का विधि-विधान

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है। हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकाण्डों के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है। तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है। शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहिए।

उपासना का विधि-विधान इस प्रकार है –

(१) ब्रह्म सन्ध्या – जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है। इसके अंतर्गत पाँच कृत्य करने होते हैं।

(अ) पवित्रीकरण – बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढँक लें एवं मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा।यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु।

(ब) आचमन – वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें। हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए।

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा।ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा।

(स) शिखा स्पर्श एवं वंदन –
शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे। निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते।तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

(द) प्राणायाम – श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ।

(य) न्यास – इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके। बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें।

ॐ वां मे आस्येऽस्तु। (मुख को)ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु। (नासिका के दोनों छिद्रों को)ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु। (दोनों नेत्रों को)ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। (दोनों कानों को)ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु। (दोनों भुजाओं को)ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु। (दोनों जंघाओं को)ॐ अरिष्टानि मेऽंगानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु। (समस्त शरीर पर)
आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि सााधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो। पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं।

(२) देवपूजन – गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री है। उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें। भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है।

ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि।गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥
ॐ श्री गायत्र्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि।

(ख) गुरु – गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है। सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः।गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।

(ग) माँ गायत्री व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है। इन्हें विधिवत् संपन्न करें। जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं। एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें। जल का अर्थ है – नम्रता-सहृदयता। अक्षत का अर्थ है – समयदान अंशदान। पुष्प का अर्थ है – प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास। धूप-दीप का अर्थ है – सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है – स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश।
ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं। कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है।

(३) जप – गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पंद्रह मिनट नियमित रूप से किया जाए। अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम। होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें। जप प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाय एवं भावना की जाय कि हम निरन्तर पवित्र हो रहे हैं। दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है।

(४) ध्यान – जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है। साकार ध्यान में गायत्री माता के अंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है। निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है।

(५) सूर्यार्घ्यदान – विसर्जन-जप समाप्ति के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में र्अघ्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है।

ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते।अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥ॐ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः॥
भावना यह करें कि जल आत्म सत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट् ब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-सम्पदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है।

इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए। जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए। सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है। मौन-मानसिक जप चौबीस घण्टे किया जा सकता है। माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें।

मां गायत्री चालीसा…

ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचंड ॥
शांति कांति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखंड ॥1॥
जगत जननी मंगल करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी । गायत्री नित कलिमल दहनी ॥॥
अक्षर चौबीस परम पुनीता । इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥॥
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा । सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥॥ हंसारूढ श्वेतांबर धारी । स्वर्ण कांति शुचि गगन-बिहारी ॥॥
पुस्तक पुष्प कमंडलु माला । शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई । सुख उपजत दुख दुर्मति खोई ॥॥ कामधेनु तुम सुर तरु छाया । निराकार की अद्भुत माया ॥॥ तुम्हरी शरण गहै जो कोई । तरै सकल संकट सों सोई ॥॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली । दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥॥
तुम्हरी महिमा पार न पावैं । जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥॥
चार वेद की मात पुनीता । तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥॥
महामंत्र जितने जग माहीं । कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै । आलस पाप अविद्या नासै ॥॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी । कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते । तुम सों पावें सुरता तेते ॥॥
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे । जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥॥ महिमा अपरम्पार तुम्हारी । जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥॥ पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना । तुम सम अधिक न जगमें आना ॥॥ तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा । तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा ॥॥ जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई । पारस परसि कुधातु सुहाई ॥॥ तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई । माता तुम सब ठौर समाई ॥॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे । सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥॥
सकल सृष्टि की प्राण विधाता । पालक पोषक नाशक त्राता ॥॥ मातेश्वरी दया व्रत धारी । तुम सन तरे पातकी भारी ॥॥
जापर कृपा तुम्हारी होई । तापर कृपा करें सब कोई ॥॥
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें । रोगी रोग रहित हो जावें ॥॥
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा । नाशै दुख हरै भव भीरा ॥॥
गृह क्लेश चित चिंता भारी । नासै गायत्री भय हारी ॥॥
संतति हीन सुसंतति पावें । सुख संपति युत मोद मनावें ॥॥
भूत पिशाच सबै भय खावें । यम के दूत निकट नहिं आवें ॥॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई । अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥॥
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी । विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥॥
जयति जयति जगदंब भवानी । तुम सम ओर दयालु न दानी ॥॥
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे । सो साधन को सफल बनावे ॥॥
सुमिरन करे सुरूचि बडभागी । लहै मनोरथ गृही विरागी ॥॥
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता । सब समर्थ गायत्री माता ॥॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी । आरत अर्थी चिंतित भोगी ॥॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें । सो सो मन वांछित फल पावें ॥॥
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ । धन वैभव यश तेज उछाउ ॥॥ सकल बढें उपजें सुख नाना । जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई ।
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥

श्री गायत्री सहस्रनामस्तोत्र

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॥ श्रीगायत्रीसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
श्रीगणेशाय नमः ॥
ध्यानम्
रक्तश्वेतहिरण्यनीलधवलैर्युक्तां त्रिनेत्रोज्ज्वलां
रक्तारक्तनवस्रजं मणिगणैर्युक्तां कुमारीमिमाम् ।
गायत्री कमलासनां करतलव्यानद्धकुण्डाम्बुजां
पद्माक्षीं च वरस्रजञ्च दधतीं हंसाधिरूढां भजे ॥
ॐ तत्काररूपा तत्वज्ञा तत्पदार्थस्वरूपिणि ।
तपस्स्व्याध्यायनिरता तपस्विजननन्नुता ॥ १॥
तत्कीर्तिगुणसम्पन्ना तथ्यवाक्च तपोनिधिः ।
तत्वोपदेशसम्बन्धा तपोलोकनिवासिनी ॥ २॥
तरुणादित्यसङ्काशा तप्तकाञ्चनभूषणा ।
तमोपहारिणि तन्त्री तारिणि ताररूपिणि ॥ ३॥
तलादिभुवनान्तस्था तर्कशास्त्रविधायिनी ।
तन्त्रसारा तन्त्रमाता तन्त्रमार्गप्रदर्शिनी ॥ ४॥
तत्वा तन्त्रविधानज्ञा तन्त्रस्था तन्त्रसाक्षिणि ।
तदेकध्याननिरता तत्वज्ञानप्रबोधिनी ॥ ५॥
तन्नाममन्त्रसुप्रीता तपस्विजनसेविता ।
साकाररूपा सावित्री सर्वरूपा सनातनी ॥ ६॥
संसारदुःखशमनी सर्वयागफलप्रदा ।
सकला सत्यसङ्कल्पा सत्या सत्यप्रदायिनी ॥ ७॥
सन्तोषजननी सारा सत्यलोकनिवासिनी ।
समुद्रतनयाराध्या सामगानप्रिया सती ॥ ८॥
समानी सामदेवी च समस्तसुरसेविता ।
सर्वसम्पत्तिजननी सद्गुणा सकलेष्टदा ॥ ९॥
सनकादिमुनिध्येया समानाधिकवर्जिता ।
साध्या सिद्धा सुधावासा सिद्धिस्साध्यप्रदायिनी ॥ १०॥
सद्युगाराध्यनिलया समुत्तीर्णा सदाशिवा ।
सर्ववेदान्तनिलया सर्वशास्त्रार्थगोचरा ॥ ११॥
सहस्रदलपद्मस्था सर्वज्ञा सर्वतोमुखी ।
समया समयाचारा सदसद्ग्रन्थिभेदिनी ॥ १२॥
सप्तकोटिमहामन्त्रमाता सर्वप्रदायिनी ।
सगुणा सम्भ्रमा साक्षी सर्वचैतन्यरूपिणी ॥ १३॥
सत्कीर्तिस्सात्विका साध्वी सच्चिदानन्दरूपिणी ।
सङ्कल्परूपिणी सन्ध्या सालग्रामनिवासिनी ॥ १४॥
सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता सत्यज्ञानप्रबोधिनी ।
विकाररूपा विप्रश्रीर्विप्राराधनतत्परा ॥ १५॥
विप्रप्रीर्विप्रकल्याणी विप्रवाक्यस्वरूपिणी ।
विप्रमन्दिरमध्यस्था विप्रवादविनोदिनी ॥ १६॥
विप्रोपाधिविनिर्भेत्री विप्रहत्याविमोचनी ।
विप्रत्राता विप्रगोत्रा विप्रगोत्रविवर्धिनी ॥ १७॥
विप्रभोजनसन्तुष्टा विष्णुरूपा विनोदिनी ।
विष्णुमाया विष्णुवन्द्या विष्णुगर्भा विचित्रिणी ॥ १८॥
वैष्णवी विष्णुभगिनी विष्णुमायाविलासिनी ।
विकाररहिता विश्वविज्ञानघनरूपिणी ॥ १९॥
विबुधा विष्णुसङ्कल्पा विश्वामित्रप्रसादिनी ।
विष्णुचैतन्यनिलया विष्णुस्वा विश्वसाक्षिणी ॥ २०॥
विवेकिनी वियद्रूपा विजया विश्वमोहिनी ।
विद्याधरी विधानज्ञा वेदतत्वार्थरूपिणी ॥ २१॥
विरूपाक्षी विराड्रूपा विक्रमा विश्वमङ्गला ।
विश्वम्भरासमाराध्या विश्वभ्रमणकारिणी ॥ २२॥
विनायकी विनोदस्था वीरगोष्ठीविवर्धिनी ।
विवाहरहिता विन्ध्या विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ २३॥
विद्याविद्याकरी विद्या विद्याविद्याप्रबोधिनी ।
विमला विभवा वेद्या विश्वस्था विविधोज्ज्वला ॥ २४॥
वीरमध्या वरारोहा वितन्त्रा विश्वनायिका ।
वीरहत्याप्रशमनी विनम्रजनपालिनी ॥ २५॥
वीरधीर्विविधाकारा विरोधिजननाशिनी ।
तुकाररूपा तुर्यश्रीस्तुलसीवनवासिनी ॥ २६॥
तुरङ्गी तुरगारूढा तुलादानफलप्रदा ।
तुलामाघस्नानतुष्टा तुष्टिपुष्टिप्रदायिनी ॥ २७॥
तुरङ्गमप्रसन्तुष्टा तुलिता तुल्यमध्यगा ।
तुङ्गोत्तुङ्गा तुङ्गकुचा तुहिनाचलसंस्थिता ॥ २८॥
तुम्बुरादिस्तुतिप्रीता तुषारशिखरीश्वरी ।
तुष्टा च तुष्टिजननी तुष्टलोकनिवासिनी ॥ २९॥
तुलाधारा तुलामध्या तुलस्था तुर्यरूपिणी ।
तुरीयगुणगम्भीरा तुर्यनादस्वरूपिणी ॥ ३०॥
तुर्यविद्यालास्यतुष्टा तूर्यशास्त्रार्थवादिनी ।
तुरीयशास्त्रतत्वज्ञा तूर्यनादविनोदिनी ॥ ३१॥
तूर्यनादान्तनिलया तूर्यानन्दस्वरूपिणी ।
तुरीयभक्तिजननी तुर्यमार्गप्रदर्शिनी ॥ ३२॥
वकाररूपा वागीशी वरेण्या वरसंविधा ।
वरा वरिष्ठा वैदेही वेदशास्त्रप्रदर्शिनी ॥ ३३॥
विकल्पशमनी वाणी वाञ्छितार्थफलप्रदा ।
वयस्था च वयोमध्या वयोवस्थाविवर्जिता ॥ ३४॥
वन्दिनी वादिनी वर्या वाङ्मयी वीरवन्दिता ।
वानप्रस्थाश्रमस्था च वनदुर्गा वनालया ॥ ३५॥
वनजाक्षी वनचरी वनिता विश्वमोहिनी ।
वसिष्ठावामदेवादिवन्द्या वन्द्यस्वरूपिणी ॥ ३६॥
वैद्या वैद्यचिकित्सा च वषट्कारी वसुन्धरा ।
वसुमाता वसुत्राता वसुजन्मविमोचनी ॥ ३७॥
वसुप्रदा वासुदेवी वासुदेव मनोहरी ।
वासवार्चितपादश्रीर्वासवारिविनाशिनी ॥ ३८॥
वागीशी वाङ्मनस्थायी वशिनी वनवासभूः ।
वामदेवी वरारोहा वाद्यघोषणतत्परा ॥ ३९॥
वाचस्पतिसमाराध्या वेदमाता विनोदिनी ।
रेकाररूपा रेवा च रेवातीरनिवासिनी ॥ ४०॥
राजीवलोचना रामा रागिणिरतिवन्दिता ।
रमणीरामजप्ता च राज्यपा राजताद्रिगा ॥ ४१॥
राकिणी रेवती रक्षा रुद्रजन्मा रजस्वला ।
रेणुकारमणी रम्या रतिवृद्धा रता रतिः ॥ ४२॥
रावणानन्दसन्धायी राजश्री राजशेखरी ।
रणमद्या रथारूढा रविकोटिसमप्रभा ॥ ४३॥
रविमण्डलमध्यस्था रजनी रविलोचना ।
रथाङ्गपाणि रक्षोघ्नी रागिणी रावणार्चिता ॥ ४४॥
रम्भादिकन्यकाराध्या राज्यदा राज्यवर्धिनी ।
रजताद्रीशसक्थिस्था रम्या राजीवलोचना ॥ ४५॥
रम्यवाणी रमाराध्या राज्यधात्री रतोत्सवा ।
रेवती च रतोत्साहा राजहृद्रोगहारिणी ॥ ४६॥
रङ्गप्रवृद्धमधुरा रङ्गमण्डपमध्यगा ।
रञ्जिता राजजननी रम्या राकेन्दुमध्यगा ॥ ४७॥
राविणी रागिणी रञ्ज्या राजराजेश्वरार्चिता ।
राजन्वती राजनीती रजताचलवासिनी ॥ ४८॥
राघवार्चितपादश्री राघवा राघवप्रिया ।
रत्ननूपुरमध्याढ्या रत्नद्वीपनिवासिनी ॥ ४९॥
रत्नप्राकारमध्यस्था रत्नमण्डपमध्यगा ।
रत्नाभिषेकसन्तुष्टा रत्नाङ्गी रत्नदायिनी ॥ ५०॥

णिकाररूपिणी नित्या नित्यतृप्ता निरञ्जना ।
निद्रात्ययविशेषज्ञा नीलजीमूतसन्निभा ॥ ५१॥
नीवारशूकवत्तन्वी नित्यकल्याणरूपिणी ।
नित्योत्सवा नित्यपूज्या नित्यानन्दस्वरूपिणी ॥ ५२॥
निर्विकल्पा निर्गुणस्था निश्चिन्ता निरुपद्रवा ।
निस्संशया निरीहा च निर्लोभा नीलमूर्धजा ॥ ५३॥
निखिलागममध्यस्था निखिलागमसंस्थिता ।
नित्योपाधिविनिर्मुक्ता नित्यकर्मफलप्रदा ॥ ५४॥
नीलग्रीवा निराहारा निरञ्जनवरप्रदा ।
नवनीतप्रिया नारी नरकार्णवतारिणी ॥ ५५॥
नारायणी निरीहा च निर्मला निर्गुणप्रिया ।
निश्चिन्ता निगमाचारनिखिलागम च वेदिनी ॥ ५६॥
निमेषानिमिषोत्पन्ना निमेषाण्डविधायिनी ।
निवातदीपमध्यस्था निर्विघ्ना नीचनाशिनी ॥ ५७॥
नीलवेणी नीलखण्डा निर्विषा निष्कशोभिता ।
नीलांशुकपरीधाना निन्दघ्नी च निरीश्वरी ॥ ५८॥
निश्वासोच्छ्वासमध्यस्था नित्ययानविलासिनी ।
यङ्काररूपा यन्त्रेशी यन्त्री यन्त्रयशस्विनी ॥ ५९॥
यन्त्राराधनसन्तुष्टा यजमानस्वरूपिणी ।
योगिपूज्या यकारस्था यूपस्तम्भनिवासिनी ॥ ६०॥
यमघ्नी यमकल्पा च यशःकामा यतीश्वरी ।
यमादीयोगनिरता यतिदुःखापहारिणी ॥ ६१॥
यज्ञा यज्वा यजुर्गेया यज्ञेश्वरपतिव्रता ।
यज्ञसूत्रप्रदा यष्ट्री यज्ञकर्मफलप्रदा ॥ ६२॥
यवाङ्कुरप्रिया यन्त्री यवदघ्नी यवार्चिता ।
यज्ञकर्ती यज्ञभोक्त्री यज्ञाङ्गी यज्ञवाहिनी ॥ ६३॥
यज्ञसाक्षी यज्ञमुखी यजुषी यज्ञरक्षिणी ।
भकाररूपा भद्रेशी भद्रकल्याणदायिनी ॥ ६४॥
भक्तप्रिया भक्तसखा भक्ताभीष्टस्वरूपिणी ।
भगिनी भक्तसुलभा भक्तिदा भक्तवत्सला ॥ ६५॥
भक्तचैतन्यनिलया भक्तबन्धविमोचनी ।
भक्तस्वरूपिणी भाग्या भक्तारोग्यप्रदायिनी ॥ ६६॥
भक्तमाता भक्तगम्या भक्ताभीष्टप्रदायिनी ।
भास्करी भैरवी भोग्या भवानी भयनाशिनी ॥ ६७॥
भद्रात्मिका भद्रदायी भद्रकाली भयङ्करी ।
भगनिष्यन्दिनी भूम्नी भवबन्धविमोचनी ॥ ६८॥
भीमा भवसखा भङ्गीभङ्गुरा भीमदर्शिनी ।
भल्ली भल्लीधरा भीरुर्भेरुण्डा भीमपापहा ॥ ६९॥
भावज्ञा भोगदात्री च भवघ्नी भूतिभूषणा ।
भूतिदा भूमिदात्री च भूपतित्वप्रदायिनी ॥ ७०॥
भ्रामरी भ्रमरी भारी भवसागरतारिणी ।
भण्डासुरवधोत्साहा भाग्यदा भावमोदिनी ॥ ७१॥
गोकाररूपा गोमाता गुरुपत्नी गुरुप्रिया ।
गोरोचनप्रिया गौरी गोविन्दगुणवर्धिनी ॥ ७२॥
गोपालचेष्टासन्तुष्टा गोवर्धनविवर्धिनी ।
गोविन्दरूपिणी गोप्त्री गोकुलानांविवर्धिनी ॥ ७३॥
गीता गीतप्रिया गेया गोदा गोरूपधारिणी ।
गोपी गोहत्यशमनी गुणिनी गुणिविग्रहा ॥ ७४॥
गोविन्दजननी गोष्ठा गोप्रदा गोकुलोत्सवा ।
गोचरी गौतमी गङ्गा गोमुखी गुणवासिनी ॥ ७५॥
गोपाली गोमया गुम्भा गोष्ठी गोपुरवासिनी ।
गरुडा गमनश्रेष्ठा गारुडा गरुडध्वजा ॥ ७६॥
गम्भीरा गण्डकी गुण्डा गरुडध्वजवल्लभा ।
गगनस्था गयावासा गुणवृत्तिर्गुणोद्भवा ॥ ७७॥
देकाररूपा देवेशी दृग्रूपा देवतार्चिता ।
देवराजेश्वरार्धाङ्गी दीनदैन्यविमोचनी ॥ ७८॥
देकालपरिज्ञाना देशोपद्रवनाशिनी ।
देवमाता देवमोहा देवदानवमोहिनी ॥ ७९॥
देवेन्द्रार्चितपादश्री देवदेवप्रसादिनी ।
देशान्तरी देशरूपा देवालयनिवासिनी ॥ ८०॥
देशभ्रमणसन्तुष्टा देशस्वास्थ्यप्रदायिनी ।
देवयाना देवता च देवसैन्यप्रपालिनी ॥ ८१॥
वकाररूपा वाग्देवी वेदमानसगोचरा ।
वैकुण्ठदेशिका वेद्या वायुरूपा वरप्रदा ॥ ८२॥
वक्रतुण्डार्चितपदा वक्रतुण्डप्रसादिनी ।
वैचित्र्यरूपा वसुधा वसुस्थाना वसुप्रिया ॥ ८३॥
वषट्कारस्वरूपा च वरारोहा वरासना ।
वैदेही जननी वेद्या वैदेहीशोकनाशिनी ॥ ८४॥
वेदमाता वेदकन्या वेदरूपा विनोदिनी ।
वेदान्तवादिनी चैव वेदान्तनिलयप्रिया ॥ ८५॥
वेदश्रवा वेदघोषा वेदगीता विनोदिनी ।
वेदशास्त्रार्थतत्वज्ञा वेदमार्ग प्रदर्शिनी ॥ ८६॥
वैदिकीकर्मफलदा वेदसागरवाडवा ।
वेदवन्द्या वेदगुह्या वेदाश्वरथवाहिनी ॥ ८७॥
वेदचक्रा वेदवन्द्या वेदाङ्गी वेदवित्कविः ।
सकाररूपा सामन्ता सामगान विचक्षणा ॥ ८८॥
साम्राज्ञी नामरूपा च सदानन्दप्रदायिनी ।
सर्वदृक्सन्निविष्टा च सर्वसम्प्रेषिणीसहा ॥ ८९॥
सव्यापसव्यदा सव्यसध्रीची च सहायिनी ।
सकला सागरा सारा सार्वभौमस्वरूपिणी ॥ ९०॥
सन्तोषजननी सेव्या सर्वेशी सर्वरञ्जनी ।
सरस्वती समाराद्या सामदा सिन्धुसेविता ॥ ९१॥
सम्मोहिनी सदामोहा सर्वमाङ्गल्यदायिनी ।
समस्तभुवनेशानी सर्वकामफलप्रदा ॥ ९२॥
सर्वसिद्धिप्रदा साध्वी सर्वज्ञानप्रदायिनी ।
सर्वदारिद्र्यशमनी सर्वदुःखविमोचनी ॥ ९३॥
सर्वरोगप्रशमनी सर्वपापविमोचनी ।
समदृष्टिस्समगुणा सर्वगोप्त्री सहायिनी ॥ ९४॥
सामर्थ्यवाहिनि साङ्ख्या सान्द्रानन्दपयोधरा ।
सङ्कीर्णमन्दिरस्थाना साकेतकुलपालिनी ॥ ९५॥
संहारिणी सुधारूपा साकेतपुरवासिनी ।
सम्बोधिनी समस्तेशी सत्यज्ञानस्वरूपिणी ॥ ९६॥
सम्पत्करी समानाङ्गी सर्वभावसुसंस्थिता ।
सन्ध्यावन्दनसुप्रीता सन्मार्गकुलपालिनी ॥ ९७॥
सञ्जीविनी सर्वमेधा सभ्या साधुसुपूजिता ।
समिद्धा सामिघेनी च सामान्या सामवेदिनी ॥ ९८॥
समुत्तीर्णा सदाचारा संहारा सर्वपावनी ।
सर्पिणी सर्पमाता च समादानसुखप्रदा ॥ ९९॥
सर्वरोगप्रशमनी सर्वज्ञत्वफलप्रदा ।
सङ्क्रमा समदा सिन्धुः सर्गादिकरणक्षमा ॥ १००॥

सङ्कटा सङ्कटहरा सकुङ्कुमविलेपना ।
सुमुखा सुमुखप्रीता समानाधिकवर्जिता ॥ १०१॥
संस्तुता स्तुतिसुप्रीता सत्यवादी सदास्पदा ।
धीकाररूपा धीमाता धीरा धीरप्रसादिनी ॥ १०२॥
धीरोत्तमा धीरधीरा धीरस्था धीरशेखरा ।
धृतिरूपा धनाढ्या च धनपा धनदायिनी ॥ १०३॥
धीरूपा धीरवन्द्या च धीप्रभा धीरमानसा ।
धीगेया धीपदस्था च धीशाना धीप्रसादिनी ॥ १०४॥
मकाररूपा मैत्रेया महामङ्गलदेवता ।
मनोवैकल्यशमनी मलयाचलवासिनी ॥ १०५॥
मलयध्वजराजश्रीर्मायामोहविभेदिनी ।
महादेवी महारूपा महाभैरवपूजिता ॥ १०६॥
मनुप्रीता मन्त्रमूर्तिर्मन्त्रवश्या महेश्वरी ।
मत्तमातङ्गगमना मधुरा मेरुमण्टपा ॥ १०७॥
महागुप्ता महाभूता महाभयविनाशिनी ।
महाशौर्या मन्त्रिणी च महावैरिविनाशिनी ॥ १०८॥
महालक्ष्मीर्महागौरी महिषासुरमर्दिनी ।
मही च मण्डलस्था च मधुरागमपूजिता ॥ १०९॥
मेधा मेधाकरी मेध्या माधवी मधुमर्धिनी ।
मन्त्रा मन्त्रमयी मान्या माया माधवमन्त्रिणी ॥ ११०॥
मायादूरा च मायावी मायाज्ञा मानदायिनी ।
मायासङ्कल्पजननी मायामायविनोदिनी ॥ १११॥
माया प्रपञ्चशमनी मायासंहाररूपिणी ।
मायामन्त्रप्रसादा च मायाजनविमोहिनी ॥ ११२॥
महापथा महाभोगा महविघ्नविनाशिनी ।
महानुभावा मन्त्राढ्या महमङ्गलदेवता ॥ ११३॥
हिकाररूपा हृद्या च हितकार्यप्रवर्धिनी ।
हेयोपाधिविनिर्मुक्ता हीनलोकविनाशिनी ॥ ११४॥
ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या ह्रीं देवी ह्रीं स्वभाविनी ।
ह्रीं मन्दिरा हितकरा हृष्टा च ह्रीं कुलोद्भवा ॥ ११५॥
हितप्रज्ञा हितप्रीता हितकारुण्यवर्धिनी ।
हितासिनी हितक्रोधा हितकर्मफलप्रदा ॥ ११६॥
हिमा हैमवती हैम्नी हेमाचलनिवासिनी ।
हिमागजा हितकरी हितकर्मस्वभाविनी ॥ ११७॥
धीकाररूपा धिषणा धर्मरूपा धनेश्वरी ।
धनुर्धरा धराधारा धर्मकर्मफलप्रदा ॥ ११८॥
धर्माचारा धर्मसारा धर्ममध्यनिवासिनी ।
धनुर्विद्या धनुर्वेदा धन्या धूर्तविनाशिनी ॥ ११९॥
धनधान्याधेनुरूपा धनाढ्या धनदायिनी ।
धनेशी धर्मनिरता धर्मराजप्रसादिनी ॥ १२०॥
धर्मस्वरूपा धर्मेशी धर्माधर्मविचारिणी ।
धर्मसूक्ष्मा धर्मगेहा धर्मिष्ठा धर्मगोचरा ॥ १२१॥
योकाररूपा योगेशी योगस्था योगरूपिणी ।
योग्या योगीशवरदा योगमार्गनिवासिनी ॥ १२२॥
योगासनस्था योगेशी योगमायाविलासिनी ।
योगिनी योगरक्ता च योगाङ्गी योगविग्रहा ॥ १२३॥
योगवासा योगभाग्या योगमार्गप्रदर्शिनी ।
योकाररूपा योधाढ्यायोध्री योधसुतत्परा ॥ १२४॥
योगिनी योगिनीसेव्या योगज्ञानप्रबोधिनी ।
योगेश्वरप्राणानाथा योगीश्वरहृदिस्थिता ॥ १२५॥
योगा योगक्षेमकर्त्री योगक्षेमविधायिनी ।
योगराजेश्वराराध्या योगानन्दस्वरूपिणी ॥ १२६॥
नकाररूपा नादेशी नामपारायणप्रिया ।
नवसिद्धिसमाराध्या नारायणमनोहरी ॥ १२७॥
नारायणी नवाधारा नवब्रह्मार्चितांघ्रिका ।
नगेन्द्रतनयाराध्या नामरूपविवर्जिता ॥ १२८॥
नरसिंहार्चितपदा नवबन्धविमोचनी ।
नवग्रहार्चितपदा नवमीपूजनप्रिया ॥ १२९॥
नैमित्तिकार्थफलदा नन्दितारिविनाशिनी ।
नवपीठस्थिता नादा नवर्षिगणसेविता ॥ १३०॥
नवसूत्राविधानज्ञा नैमिशारण्यवासिनी ।
नवचन्दनदिग्धाङ्गी नवकुङ्कुमधारिणी ॥ १३१॥
नववस्त्रपरीधाना नवरत्नविभूषणा ।
नव्यभस्मविदग्धाङ्गी नवचन्द्रकलाधरा ॥ १३२॥
प्रकाररूपा प्राणेशी प्राणसंरक्षणीपरा ।
प्राणसञ्जीविनी प्राच्या प्राणिप्राणप्रबोधिनी ॥ १३३॥
प्रज्ञा प्राज्ञा प्रभापुष्पा प्रतीची प्रभुदा प्रिया ।
प्राचीना प्राणिचित्तस्था प्रभा प्रज्ञानरूपिणी ॥ १३४॥
प्रभातकर्मसन्तुष्टा प्राणायामपरायणा ।
प्रायज्ञा प्रणवा प्राणा प्रवृत्तिः प्रकृतिः परा ॥ १३५॥
प्रबन्धा प्रथमा चैव प्रगा प्रारब्धनाशिनी ।
प्रबोधनिरता प्रेक्ष्या प्रबन्धा प्राणसाक्षिणी ॥ १३६॥
प्रयागतीर्थनिलया प्रत्यक्षपरमेश्वरी ।
प्रणवाद्यन्तनिलया प्रणवादिः प्रजेश्वरी ॥ १३७॥
चोकाररूपा चोरघ्नी चोरबाधाविनाशिनी ।
चैतन्यचेतनस्था च चतुरा च चमत्कृतिः ॥ १३८॥
चक्रवर्तिकुलाधारा चक्रिणी चक्रधारिणी ।
चित्तचेया चिदानन्दा चिद्रूपा चिद्विलासिनी ॥ १३९॥
चिन्ताचित्तप्रशमनी चिन्तितार्थफलप्रदा ।
चाम्पेयी चम्पकप्रीता चण्डी चण्डाट्टहासिनी ॥ १४०॥
चण्डेश्वरी चण्डमाता चण्डमुण्डविनाशिनी ।
चकोराक्षी चिरप्रीता चिकुरा चिकुरालका ॥ १४१॥
चैतन्यरूपिणी चैत्री चेतना चित्तसाक्षिणी ।
चित्रा चित्रविचित्राङ्गी चित्रगुप्तप्रसादिनी ॥ १४२॥
चलना चक्रसंस्था च चाम्पेयी चलचित्रिणी ।
चन्द्रमण्डलमध्यस्था चन्द्रकोटिसुशीतला ॥ १४३॥
चन्द्रानुजसमाराध्या चन्द्रा चण्डमहोदरी ।
चर्चितारिश्चन्द्रमाता चन्द्रकान्ता चलेश्वरी ॥ १४४॥
चराचरनिवासी च चक्रपाणिसहोदरी ।
दकाररूपा दत्तश्रीदारिद्र्यच्छेदकारिणी ॥ १४५॥
दत्तात्रेयस्य वरदा दर्या च दीनवत्सला ।
दक्षाराध्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥ १४६॥
दक्षा दाक्षायणी दीक्षा दृष्टा दक्षवरप्रदा ।
दक्षिणा दक्षिणाराध्या दक्षिणामूर्तिरूपिणी ॥ १४७॥
दयावती दमस्वान्ता दनुजारिर्दयानिधिः ।
दन्तशोभनिभा देवी दमना दाडिमस्तना ॥ १४८॥
दण्डा च दमयत्री च दण्डिनी दमनप्रिया ।
दण्डकारण्यनिलया दण्डकारिविनाशिनी ॥ १४९॥
दंष्ट्राकरालवदना दण्डशोभा दरोदरी ।
दरिद्रारिष्टशमनी दम्या दमनपूजिता ॥ १५०॥
दानवार्चित पादश्रीर्द्रविणा द्राविणी दया ।
दामोदरी दानवारिर्दामोदरसहोदरी ॥ १५१॥
दात्री दानप्रिया दाम्नी दानश्रीर्द्विजवन्दिता ।
दन्तिगा दण्डिनी दूर्वा दधिदुग्धस्वरूपिणी ॥ १५२॥
दाडिमीबीजसन्दोहा दन्तपङ्क्तिविराजिता ।
दर्पणा दर्पणस्वच्छा द्रुममण्डलवासिनी ॥ १५३॥
दशावतारजननी दशदिग्दैवपूजिता ।
दमा दशदिशा दृश्या दशदासी दयानिधिः ॥ १५४॥
देशकालपरिज्ञाना देशकालविशोधिनी ।
दशम्यादिकलाराध्या दशकालविरोधिनी ।
दशम्यादिकलाराध्य दशग्रीवविरोधिनी ॥ १५५॥
दशापराधशमनी दशवृत्तिफलप्रदा ।
यात्काररूपिणी याज्ञी यादवी यादवार्चिता ॥ १५६॥
ययातिपूजनप्रीता याज्ञिकी याजकप्रिया ।
यजमाना यदुप्रीता यामपूजाफलप्रदा ॥ १५७॥
यशस्विनी यमाराध्या यमकन्या यतीश्वरी ।
यमादियोगसन्तुष्टा योगीन्द्रहृदया यमा ॥ १५८॥
यमोपाधिविनिर्मुक्ता यशस्यविधिसन्नुता ।
यवीयसी युवप्रीता यात्रानन्दा यतीश्वरी ॥ १५९॥
योगप्रिया योगगम्या योगध्येया यथेच्छगा ।
योगप्रिया यज्ञसेनी योगरूपा यथेष्टदा ॥ १६०॥
॥ श्रीगायत्री दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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