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Mount Everest पर 24 साल से पड़ा है ITBP जवान का शव

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Mount Everest

माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) दुनिया की सबसे ऊंची और खतरनाक चोटी है। आज ही के दिन यानी 29 मई 1953 को दो लोगों ने इस चोटी को फतह कर इतिहास रचा था। जिनका नाम एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नॉर्गे था। इन दोनों पर्वतारोहियों की कामयाबी का जश्न मनाने के लिए हर साल 29 मई को International Everest Day मनाया जाता है। माउंट एवरेस्ट खूबसूरती के साथ कई राज भी समेटे हुए है, एक ऐसी ही कहानी हम आपको बताने जा रहे है, जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

क्या है Mount Everest का ग्रीन बूट्स?

नेपाली मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक माउंट एवरेस्ट की चोटी से दो-तीन सौ मीटर नीचे एक शव 24 साल से पड़ा है। ये शव शेवांग पलजोर का है। Mount Everest पर पड़े शव के बारे में पर्वतारोही बताते हैं कि उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई थक कर सो रहा हो। अगर आप उसके बारे में नहीं जानते तो ये जान ही नहीं पाएंगे कि वो एक लाश है। इस शव की पहचान पर्वतारोही उसके हरे जूते से करते हैं। जिस वजह से शेवांग अब ग्रीन बूट्स के नाम से जाने जाते हैं। कोई उसको देखकर डर जाता है, तो कोई वहां बैठकर फोटो खिंचवाता है।

ITBP के जवान थे शेवांग पलजोर

ग्रीन बूट के नाम से चर्चित शव ITBP जवान और भारतीय पर्वतारोही शेवांग पलजोर का है। वो 10 मई 1996 को अपने साथियों के साथ माउंट एवरेस्ट को फतह करने निकले थे। इस दौरान बर्फीला तूफान आया और उनकी मौत हो गई। उनकी मौत पर आज भी विवाद है। कुछ पर्वतारोही कहते हैं कि पलजोर बर्फीले तूफान में बच सकते थे, लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की। बर्फीले तूफान के बाद वो और उनका एक साथी मदद की गुहार लगाते रहे, वहां कई पर्वतारोही मौजूद थे, लेकिन एवरेस्ट जीतने की चाहत में किसी ने उनकी मदद नहीं की। तब से लेकर आज तक उनका शव वहीं Mount Everest पर ही पड़ा है।

आईटीबीपी से नाराज हैं शेवांग की मां (Mount Everest)

शेवांग की मां ताशी एंगमो को आज भी आईटीबीपी से कई शिकायतें हैं। 2016 में उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा था कि आईटीबीपी ने शुरूआत में उनको सही जानकारी नहीं दी थी, उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि उनका बेटा एवरेस्ट पर लापता हो गया है। कई दिनों तक वो लद्दाख में आईटीबीपी के दफ्तर का चक्कर लगाती रहीं, बाद में पता चला की उनके बेटे का शव Mount Everest पर ही पड़ा है।

एवरेस्ट पर लाशें बताती हैं रास्ता (Mount Everest)

Mount Everest की ऊंचाई 8,848 मीटर के करीब है। इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन बहुत ही कम रहती है, जिस वजह से दिमाग और फेफड़े की नशें फटने लगती हैं। एवरेस्ट पर सबसे ज्यादा मौतें 8000 मीटर के ऊपर वाले हिस्से में होती है, इसलिए इसे डेथ जोन भी कहते हैं। वहीं बर्फीले तूफान भी कई पर्वतारोहियों की जान ले चुके हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 तक 308 पर्वतारोहियों की मौत एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान हुई है। उतनी ऊंचाई से शव को लाना नामुमकिन है, इसलिए ज्यादातर पर्वतारोही अपने साथियों की लाश वहीं छोड़ आते हैं। एवरेस्ट पर सामान्य तापमान माइनस 16 से माइनस 40 तक रहता है। जिस वजह से ये एक डीप फ्रीजर की तरह काम करता है और लाशें सड़ती नहीं हैं। इन लाशों की पहचान पर्वतारोही कपड़ों और जूतों से करते हैं। साथ ही लाशों की मदद से अब रास्ते की पहचान होने लगी है।

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