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300 करोड़ लोगों को खतरा आने वाले 10 सालों में, जानिए कैसे बचें

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सावधान! सुपरबग से हर साल दुनिया के करोड़ों लोग हो रहे हैं प्रभावित, एंटीबायोटिक भी बेअसर

वैज्ञानिकों ने दुनिया को आगाह किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक खास तरह का सुपरबग दुनिया के सभी अस्पतालों में तेजी से फैल रहा है, जिस पर कोई भी एंटीबायोटिक का असर नहीं होने वाला है। यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के शोधकर्ताओं ने दस देशों में इस सुपरबग पर शोध किया है।

जिसमें पता चला है कि तीन अलग-अलग प्रकार के बग तेजी से दुनिया के अस्पतालों में मौजूद हैं। इस बैक्टीरिया का नाम ‘स्टेफाइलोकोकस एपीडरमाइडिस’ है। यह इंसानी त्वचा पर पाया जाता है, खासकर उन बुजुर्ग रोगियों के शरीर में यह बहुतायत में पाए जाता है जो लंबे समय से अस्पताल में हैं और जिनके शरीर में कोई प्रॉस्थेटिक मटेरियल लगाया गया हो।

चौंकाने वाली बात यह है कि यह सुपरबग अस्पताल के वार्डों में इस्तेमाल किए गए हैंडवाश और सैनिटाइजर में मौजूद है। शोध में पता चला है कि हैंडवाश और सैनिटाइजर में पाए जाने वाले अल्कोहल आधारित कीटाणुनाशकों के लिए भी यह तेजी से सहनशील होते जा रहे हैं। 

अगर वैश्विक आंकड़ों की बात करें तो दुनियाभर में करीब एक करोड़ लोग हर वर्ष कई तरह के सुपरबग की चपेट में आ रहे हैं जिससे उनकी अकाल मृत्यु भी हो रही है। अमेरिका में एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया (सुपरबग) से हुए गंभीर संक्रमण के  लगभग 20 लाख मामले सामने आ चुके हैं। इसकी वजह से हर साल 23,000 मौत हो रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में न केवल बुजुर्ग बल्कि 50,000 नवजात भी हर वर्ष इसका शिकार हो रहे हैं। 

कृपया ध्यान से पढ़े :-

हाल ही में एक अमेरिकन स्त्री की मृत्यु एक ऐसे जीवाणु के संक्रमण से हो गयी जिस पर अब तक ज्ञात सभी ऐंटीबायोटिक बेअसर साबित हुए उसके अंदर मौजूद निमोनिया के जीवाणु ने एक जीन विकसित कर लिया जिसके कारण उस पर सभी एंटीबीओटिक फ़ैल हो गयी उस महिला का इलाज़ भारत में हुआ था इस लिए उस जीवाणु की उत्पत्ति भारत से मानी गयी और कारण भारत में सभी एंटीबीओटिक के अत्यधिक प्रयोग को माना गया।

ये क्या हुआ इसको समझने के लिए प्रकर्ति के सामान्य सिद्धांत को समझ लेते हैं जहाँ कहीं भी आहार होगा उसको पंचतत्वों (अग्नि,वायु,जल,भूमि,आकाश) में विलीन करने के लिए चारों और से माइक्रोब्स(जीवाणु) सक्रीय हो जाएंगे और तब तक कार्य करेंगे जब तक विलीनीकरण की क्रिया सम्पूर्ण नहीं हो जाती। उदहारण के लिए यदि हम एक हंडिया में मल भरकर रख देते हैं तो उसमें जीवाणु और कीड़े पैदा हो जाएंगे और तेजी से उसको मिटटी में बदलने का कार्य करने लगेंगे अब यदि प्रक्रिया के बीच में हम उसमे गमैक्ससीन नामक जहर डाल दें तो जीवाणु मर जायेंगे किन्तु प्रक्रिया अधूरी रहने की वजह से जीवाणु गमैक्ससीन से प्रतिरोध पैदा करके फिर सक्रीय होंगे और अब गमैक्सीन जहर से नहीं मरेंगे अब उनको मारने के लिए अगली पीढ़ी का ज्यादा शक्तिशाली जहर चाहिए जैसे एंडोसल्फान आदि लेकिन जीवाणु तब तक प्रतिरोध पैदा करके वापसी करता रहेगा जब तक मल का मिटटी में रूपांतरण न कर ले।

यही होता है शरीर में जब हमारा शरीर मल से भर जाता है कब्ज और कफ के रूप में और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जब मल बाहर फेंकने के लिए दस्त, उल्टी, बुखार व जुकाम शुरू करती है (इनको आयुर्वेद में मित्र रोग कहां जाता है) पर एलोपैथिक डॉक्टर उसको रोग कह कर दवाई देकर रोक देते हैं और एंटीबायोटिक नामक जहर से जीवाणु (इन्फेक्शन) को मार देते हैं परंतु शरीर की मल फैंकने की क्षमता को नहीं बढ़ाते। इस लिए इन्फेक्शन बार बार रिपीट करता है और हर बार ज्यादा शक्तिशाली एंटीबायोटिक की जरूरत पड़ती है।

ऐसा भी होता है जब वो मल एवम् इन्फेक्शन अंतरंग अंगों को फेल करने लगते हैं तथा शरीर के कार्यों में अवरोध पैदा होता है। (सेप्टीसीमिया) WHO ने 2019 तक सभी एंटीबायोटिक दवाओं के जीवाणुओं पर बेअसर होने की भविष्यवाणी कर दी है।

कई प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों जैसे ब्यूटी ब्लेंडर, मस्करा और लिप ग्लास में प्राणघातक सुपरबग का संक्रमण पाया गया है। अमेरकिा में हुए एक हालिया शोध के बाद शोधकर्ता ने यह चेतावनी दी है। अमेरिका की एस्टन यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता अमरीन बशीर ने कहा, यूके में हर दिन लाखों लोग सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करते हैं। यह उत्पाद संभावित घातक बैक्टीरिया जैसे ई.कोली और स्टैफिलोकोकी से संक्रमित होते हैं क्योंकि इन्हें साफ नहीं किया जाता और ज्यादातर समय एक्सपायरी डेट के बाद भी इस्तेमाल किया जाता है।

त्वचा में संक्रमण पैदा कर सकते हैं बैक्टीरिया : जर्नल ऑफ अप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित शोध के अनुसार 10 में से नौ सौंदर्य उत्पादों में ऐसे बैक्टीरिया पाए गए हैं जो त्वचा में संक्रमण पैदा कर सकते हैं और इससे खून भी विषाक्त हो सकता है। इन उत्पादों का आंखों, मुंह और कटे-छिले स्थानों पर इस्तेमाल करने से संक्रमण तेजी से फैलता है। इन उत्पादों से उन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है।

स्पॉन्ज में सबसे ज्यादा बैक्टीरिया: शोधकर्ताओं के अनुसार नए ब्यूटी ब्लेंडर यानी मेकअप उत्पाद चेहरे पर लगाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले स्पॉन्ज में सबसे ज्यादा मात्रा में बैक्टीरिया पाए गए हैं। 93 फीसदी ब्यूटी ब्लेंडर को साफ नहीं किया जाता जिसकी वजह से इसमें खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए हैं। 64 फीसदी ब्लेंडर को मेकअप करते समय कई बार जमीन पर गिरा दिया जाता है। इस स्पॉन्ज का इस्तेमाल चेहरे पर फाउंडेशन लगाने और चेहरे को कॉन्ट्यूर करने के लिए किया जाता है। इनका सेलिब्रिटी द्वारा काफी प्रचार किया जाता है और दुनियाभर में हर साल 65 लाख ब्यूटी ब्लेंडरों की बिक्री होती है।

खतरा : सौंदर्य प्रसाधनों में खतरनाक सुपरबग मिले

कई प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों जैसे ब्यूटी ब्लेंडर, मस्करा और लिप ग्लास में प्राणघातक सुपरबग का संक्रमण पाया गया है। अमेरकिा में हुए एक हालिया शोध के बाद शोधकर्ता ने यह चेतावनी दी है। अमेरिका की एस्टन यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता अमरीन बशीर ने कहा, यूके में हर दिन लाखों लोग सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करते हैं। यह उत्पाद संभावित घातक बैक्टीरिया जैसे ई.कोली और स्टैफिलोकोकी से संक्रमित होते हैं क्योंकि इन्हें साफ नहीं किया जाता और ज्यादातर समय एक्सपायरी डेट के बाद भी इस्तेमाल किया जाता है।

त्वचा में संक्रमण पैदा कर सकते हैं बैक्टीरिया : 

जर्नल ऑफ अप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित शोध के अनुसार 10 में से नौ सौंदर्य उत्पादों में ऐसे बैक्टीरिया पाए गए हैं जो त्वचा में संक्रमण पैदा कर सकते हैं और इससे खून भी विषाक्त हो सकता है। इन उत्पादों का आंखों, मुंह और कटे-छिले स्थानों पर इस्तेमाल करने से संक्रमण तेजी से फैलता है। इन उत्पादों से उन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है।

स्पॉन्ज में सबसे ज्यादा बैक्टीरिया: 

शोधकर्ताओं के अनुसार नए ब्यूटी ब्लेंडर यानी मेकअप उत्पाद चेहरे पर लगाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले स्पॉन्ज में सबसे ज्यादा मात्रा में बैक्टीरिया पाए गए हैं। 93 फीसदी ब्यूटी ब्लेंडर को साफ नहीं किया जाता जिसकी वजह से इसमें खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए हैं। 64 फीसदी ब्लेंडर को मेकअप करते समय कई बार जमीन पर गिरा दिया जाता है। इस स्पॉन्ज का इस्तेमाल चेहरे पर फाउंडेशन लगाने और चेहरे को कॉन्ट्यूर करने के लिए किया जाता है। इनका सेलिब्रिटी द्वारा काफी प्रचार किया जाता है और दुनियाभर में हर साल 65 लाख ब्यूटी ब्लेंडरों की बिक्री होती है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि यह ब्यूटी ब्लेंडर ज्यादातर गीला छोड़ दिया जाता है जिसकी वजह से इसमें बैक्टीरिया का प्रसार होता है। शोधकर्ता बशीर ने कहा, सौंदर्य उत्पादों में मौजूद ई.कोली जैसे बैक्टीरिया चेहरे पर संक्रमण का कारण बनते हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं द्वारा ब्यूटी ब्लेंडर और ब्रश की साफ सफाई न करना चिंता का कारण है।

शोध के निष्कर्षों के अनुसार उपभोक्ता अनजाने में खुद को खतरे में डाल रहे हैं। वहीं, इन सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माताओं और नियम बनाने वाले संस्थान को भी उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए और काम करने की जरूरत है। उन्होंने सलाह दी कि सौंदर्य उत्पादों पर एक्सपायरी डेट और साफ-सफाई करने के बारे में निर्देश बड़े शब्दों में लिखे होने चाहिए ताकि उपभोक्ता उनका पालन करें।

डिटॉक्सीफिकेशन क्या है ?

आयुर्वेद में ऐसे मरीज़ जिन पर दवाइयों का असर समाप्त हो जाता है उनको पंचकर्म (उलटी, दस्त, पसीना, तेल मालिश, वस्ति) द्वारा शरीर से मल निकाल दिए जाते हैं तो औषधि उन पर पुनः कार्य करने लगती है।

यही कार्य योग में शंखप्रक्षालन की क्रिया द्वारा किया जाता है जिसमे गर्म पानी सेंधा नमक व नींबू डाल कर पिया जाता है व विशेष आसान किये जाते हैं जिससे दस्त शुरू हो जाते हैं ये तब तक किया जाता है जब तक पानी पीकर पानी ही बाहर न आने लगे।

कफ निकालने के लिए जल नेति एवं कुंज्जर क्रिया (पानी पीकर उलटी करना) का अभ्यास किया जाता है जिससे नज़ला-जुकाम- दमा-निमोनिया आदि का जड़ से निदान हो जाता है और वो दुबारा नहीं पनपता है।

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ऊपर दिए उदाहरण से स्पष्ट है कि एलोपेथी ने कितना विकास किया है।

दरअसल वो गन्दगी को बिना साफ़ किये जहर के इंजेक्शन से इन्फेक्शन नियंत्रण करना चाहते हैं।

जो कि सिद्धांतत: गलत है और उसका अंत आखिर एलोपैथिक चिकित्सा के हार के रूप में ही मिलना है तो भारत पर इसका आरोप डाल कर पश्चिम जगत अपनी उपचार पद्धति की हार को लंबे समय तक नहीं छुपा सकेगा।

तब तक आइये स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत अपने शरीर की मलशुद्धि के साथ शुरू करते हैं और दिखा देते हैं पश्चिम जगत को कि एंटीबायोटिक के फेल होने से हम नहीं मरने वाले।

अपनी आंतों की सफाई करने का आसान तरीका !

अपनी आंतों की सफाई करने का बेहतरीन तरीका। जो आपको लगभग 15 दिनों में एक बार जरूर करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको पेट की समस्या नहीं होगी जैसे कि कब्ज का होना और पेट दर्द का होना। कब्ज की शिकायत से राहत मिलेगी ही साथ ही आपको अनेकों बहुत सी बीमारियों से राहत मिलेगी। तो चलिए जानिए कैसे करे 15 दिनों में अपनी आंतों की सफाई।

ऐसा करें-

आप एक चम्मच त्रिफला पाउडर लें और एक चम्मच शहद लें फिर आप इन दोनों को एक गिलास दूध में डालकर अच्छे से मिला लें। मिलाने के बाद आप इस दूध को लगभग 5 मिनट तक ऐसे ही रख दें। फिर आप उसको पी लें व सो जाए। ऐसा करने के बाद जब आप सुबह उठकर शौच जाएंगे तो आपका पेट उस वक़्त साफ हो जाएगा पूरा गंदगी उस समय एक झटले मव बाहर निकल जाएगी। यह आयुर्वेदानुसार बेहद कारगर तरीका है आंतों की सफाई करने का।

इन 10 घरेलू उपचार से करें अपनी किडनी की सफाई

लाल अंगूर
लाल अंगूर में विटामिन-सी, ए और बी6 काफी मात्रा में होता है। साथ ही इसमें फोलेट, पोटैशियम, आयरन, कैल्शियम भी पाया जाता है। इसे खाने से आपको कब्ज, थकान और पेट से जुड़ी समस्याएं नहीं होती हैं। यह किडनी से सारे विषैले तत्व बाहर निकाल देता है और किडनी को स्वस्थ्य रखता है।

2. नींबू
विटामिन सी शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने में सहायक होता है। रोज एक गिलास पानी में एक नींबू का रस निचोड़कर पीने से किडनी संबंधी बीमारियों में लाभ होता है।

3. धनिया
धनिया में मैगनीज, आयरन, मैग्निशियम, विटामिन सी, विटामिन के और प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है। इसमें बहुत कम मात्रा में कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, थायमिन और कैरोटीन होता है। इसलिए किडनियों की सफाई के लिए धनिया बहुत फायदेमंद है।

4. अदरक
अदरक में आयरन, कैल्शियम, आयोडीन, क्लो‍रीन व विटामिन सहित कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं। जो किडनी से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाल देते हैं।

5. अजवाइन
भारतीय रसोई की एक खास चीज है अजवायन। खाने का स्वाद बढ़ाने से लेकर कई बीमारियों में इलाज के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। अजवाइन पाचक और पित्तवर्धक होती है। यह पेट से जुड़ी सभी बीमारियों में लाभकारी है। इसके रोज सेवन से किडनी स्वस्थ्य़ रहती हैं।

6. अजमोद (पार्सले)
इसमें विटामिन ए, विटामिन सी और पोटेशियम होता है जो किडनी के लिए फायदेमंद है। इसमें पाया जाने वाला लूटेओलिन एंटीआक्सीडेंट यूरिक एसिड को किडनी से बाहर निकालता है और रक्त शुद्ध करता है।

7. करौंदा
करौंदे में विटामिन C प्रचुर मात्रा में होने के साथ-साथ अत्यधिक एंटी-ऑक्सीडेंट पाया जाता है| करौंदा विटामिन E तथा K का भी अच्छा स्त्रोत है| इससे हमें इन विटामिनों के अतिरिक्त आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम, जिंक इत्यादि मिनरल्स भी प्राप्त होते हैं। यह किडनी से यूरिक एसिड को बाहर निकालता है। करौंदे के नियमित सेवन से किडनी स्वस्थ्य रहती हैं।

8. लाल शिमला मिर्च
लाल शिमला मिर्च में विटामिन ए, सी , बी6, फोलिक एसिड और रेशे पाये जाते हैं। इसके अलावा इसमें पोटैशियम की मात्रा भी कम होती है। जो किडनी को साफ रखने में मदद करते हैं।

9. दही
दही पाचन क्रिया को तो अच्छा करता ही है साथ ही इसमें प्रोबायोटिक बैक्टीरिया होता है जो किडनियों की सफाई भी करता है। इसमें मौजूद गुड बैक्टीरिया इम्यून सिस्टम को भी बेहतर बनाते हैं।

10. गुडूची
गुडूची एक अच्छा मूत्रवर्धक है। इसके सेवन से पेशाब के साथ किडनी से विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं। इसके अलावा ये शराब और धूम्रपान करने वालों के लिए भी बहुत लाभदायक है। आप गुडूची के पत्तों का रस पी सकते हैं। बाजार में गुडूची कैप्सूल भी उपलब्ध हैं।

यूं हफ्ते भर में पहले जैसा साफ़ कर सकते हैं अपना लीवर

लिवर से विषैले पदार्थों को आसानी से बाहर कर सकता है. अगर आप भी अपने लिवर को चुस्त-दुरुस्त रखना चाहें तो इसका सेवन कर सकते हैं-

लौकी का जूस

इसे बनाने के लिए आपको जरूरत होगी; लौकी, हल्दी, धनिया, नींबू, काले नमक और गिलोय की. लिवर की गंदगी को बाहर निकालने के लिए ये सारे ही खाद्य पदार्थ बहुत कारगर होते हैं. इनसे न केवल लिवर की गंदगी बाहर निकल जाती है बल्कि ये सारे ही शरीर के लिए इम्यूनिटी बूस्टर का काम भी करते हैं.

ऐसे करें तैयार-

सबसे पहले लौकी को छील लें. इसके बाद लौकी और धनिया को ग्राइंड करके 1 गिलास जूस निकालें. फिर इसमें 1 चम्मच हल्दी, 1 चम्मच काला नमक, 1 चम्मच नींबू का रस और 30 मिली गिलोय का रस मिलाएं. इसे अच्छे से मिला लें. इस तरह से तैयार है आपका जूस जो आपको लिवर से विषैले टॉक्सिन निकालने में मदद करेगा. बस रोज खाली पेट इसका सेवन करें. ज्यादा बेहतर होगा अगर आप सवेरे इस ड्रिंक को पिएं. वैसे इसे भोजन के तुरंत बाद भी पिया जा सकता है. रोज इस ड्रिंक का सेवन करने से न सिर्फ लिवर से टॉक्सिन बाहर निकल जाते हैं बल्कि इम्यून सिस्टम भी ठीक रहता है.

गाजर-आंवले का जूस
गाजर का जूस बनाने के लिए जरूरत होगी, 150 मिली गाजर के जूस की, 20 मिली आंवले के जूस की और सेंधा नमक की. तीनों को मिला लें और रोजाना नाश्ते के साथ इस जूस का सेवन करें. यह लिवर को डिटॉक्स करने के साथ लिवर की सूजन को भी 1 हफ्ते में कम कर देता है. इसके अलावा यह जूस आपकी लिवर की समस्याओं को भी दूर करता है.

पालक और चुकंदर का जूस
इसे बनाने को पालक के पत्तों का 100 मिली जूस निकालें. इसमें 30 मिली चुकंदर का जूस और चुटकी भर काली मिर्च मिलाएं. खाने के बाद रोजाना इसका सेवन करें. इसके सेवन से लीवर तो ठीक होता है, साथ ही खून की कमी भी पूरी हो जाती है. अगर आप इस जूस को बच्चों को देना है तो इसमें गाजर और अनार का जूस भी डाल सकते हैं.

यदि उनको जीवित रहना है तथा रोगों का स्थायी उपचार करना है तो हमारी भारतीय चिकित्सा प्रणाली ”पंचगव्य, आयुर्वेद,प्राकृतिक चिकित्सा/योग ” की शरण में आना ही होगा।

सर्वाणाम् रोगणाम् कारणम् – कुपित मलम्।
टाक्सिन को निकलने में मदद करेगी आयुर्वेदिक प्रक्रिया।

अत: मिट्टी-पानी-व्रत-धूप-हवा से, सारे रोग मिटाईये। पंचगव्य, आयुर्वेद, नेचुरोपैथी को अपनाकर, जीवन स्वस्थ बनाईये।
शुद्ध-सात्विक रहन-सहन, और सादा भोजन खाईये।
पका-आहार को घटा-घटा कर, ताजा फल सब्जी-आहार अपनाईये।

बीमारियों के इलाज के दौरान आवश्यकता पड़ने पर एंटीबायोटिक दवाओं का संतुलित इस्तेमाल करना चाहिए। रोगियों के परिजनों का काउंसलिंग कर उनके माइंडसेट को बदलना होगा ताकि वे चिकित्सकों को एंटीबायोटिक दवाओं को लिखने के लिए बाध्य नहीं करें। सुपरबग की स्थिति खतरनाक मानी जाती है। गंदगी से दूर रहना आवश्यक है।’

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